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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 973 of 1855

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Page 973

बाधतां द्वेषो अभयं कृणोतु सुवीर्यस्य पतयः स्याम.. (१२)
भली-भांति रक्षा करने वाले एवं धनस्वामी इंद्र अपने रक्षा-साधनों से मुझे सुखदाता हों.
सब कुछ जानने वाले इंद्र हमारे शत्रुओं को मारें एवं हमें अभय बनावें. हम इंद्र की कृपा से
शोभन वीरों के स्वामी बनें. (१२)
तस्य वयं सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम.
स सुत्रामा स्ववाँ इन्द्रो अस्मे आराच्चिद् द्वेषः सनुतर्युयोतु.. (१३)
हम यज्ञपात्र इंद्र की शोभन-अनुग्रह-बुद्धि एवं कल्याणकारी-मित्रता-भाव के पात्र बनें.
शोभन, रक्षक और धनवान् इंद्र द्वेष करने वालों को हमसे दूर करें. (१३)
अव त्वे इन्द्र प्रवतो नोर्मिर्गिरो ब्रह्माणि नियुतो धवन्ते.
ऊरू न राधः सवना पुरूण्यपो गा वज्रिन्युवसे समिन्दून्.. (१४)
हे इंद्र! जलसमूह जिस प्रकार निचले स्थान की ओर बहता है, उसी प्रकार स्तोताओं की
स्तुतियां, सोमरूप स्तोत्र विशाल धन व विस्तृत सोमरस तुम्हारे पास जाते हैं. हे वज्रधारी इंद्र!
तुम सोमरस में गोरस एवं जल भली प्रकार मिलाते हो. (१४)
क ईं स्तवत्कः पृणात्को यजाते यदुग्रमिन्मघवा विश्वहावेत्.
पादाविव प्रहरन्नन्यमन्यं कृणोति पूर्वमपरं शचीभिः.. (१५)
कौन इंद्र की स्तुति कर सकता है, कौन इन्हें प्रसन्न कर सकता है एवं कौन इनका यज्ञ
कर सकता है? इंद्र अपने को सदा उग्र जानते हैं. इंद्र मार्ग में आगेपीछे पड़ने वाले पैरों के
समान स्तोता को अपनी बुद्धि द्वारा कभी अपने आगे और कभी अपने पीछे रखते हैं. (१५)
शृण्वे वीर उग्रमुग्रं दमयन्नन्यमन्यमतिनेनीयमानः.
एधमानद् विळुभयस्य राजा चोष्कूयते विश इन्द्रो मनुष्यान्.. (१६)
इंद्र प्रबलशत्रु का दमन करते हुए एवं स्तोताओं के लिए बार-बार स्थान बदलते हुए वीर
के रूप में प्रसिद्ध होते हैं. सोमरस न निचोड़ने वाले उन्नत लोगों के द्वेषी तथा दिव्य-पार्थिव
दोनों संपत्तियों के स्वामी इंद्र अपने सेवकों को रक्षा के लिए बार-बार बुलाते हैं. (१६)
परा पूर्वेषां सख्या वृणक्ति वितर्तुराणो अपरेभिरेति.
अनानुभूतीरवधून्वानः पूर्वीरिन्द्रः शरदस्तर्तरीति.. (१७)
इंद्र प्राचीन यज्ञकर्त्ताओं की मित्रता त्याग देते हैं एवं उनकी हिंसा करते हुए साधारण
यज्ञकर्त्ताओं के मित्र बनते हैं. इंद्र परिचर्यरहित प्रजाओं को छोड़कर स्तोताओं के साथ
अनेक वर्ष तक रहते हैं. (१७)
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