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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 972 of 1855

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Page 972

हे शूर इंद्र! तुम कलश में रखा हुआ सोमरस पिओ और धन निमित्तक युद्ध में शत्रुओं
का नाश करो. हे धनपात्र इंद्र! दोपहर के यज्ञ में सोमरस से अपना पेट भरो एवं हमें धन दो.
(६)
इन्द्र प्र णः पुरएतेव पश्य प्र नो नय प्रतरं वस्यो अच्छ.
भवा सुपारो अतिपारयो नो भवा सुनीतिरुत वामनीतिः.. (७)
हे इंद्र! आगे चलने वाले मार्गदर्शक के समान हमको देखो, हमारे सामने उत्तम धन
लाओ तथा हमें दुःखों एवं शत्रुओं से पार करो. तुम उत्तम नेता बनकर हमें धन की ओर
चलाओ. (७)
उरुं नो लोकमनु नेषि विद्वान्त्स्वर्वज्ज्योतिरभयं स्वस्ति.
ऋष्वा त इन्द्र स्थविरस्य बाहू उप स्थेयाम शरणां बृहन्ता.. (८)
हे विद्वान् इंद्र! हमें विस्तीर्ण स्वर्ग में ले चलो. वह स्वर्ग प्रकाशपूर्ण एवं भयरहित है. हे
शक्तिशाली इंद्र! हम तुम्हारी सुंदर एवं दृढ़ भुजाओं पर अपनी रक्षा के लिए भरोसा करते हैं.
(८)
वरिष्ठे न इन्द्र वन्धुरे धा वहिष्ठयोः शतावन्नश्वयोरा.
इषमा वक्षीषां वर्षिष्ठां मा नस्तारीन्मघवन्नायो अर्यः.. (९)
हे सैकड़ों संपत्तियों के स्वामी इंद्र! वहन करने में कुशल घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले
विस्तृत रथ पर हमें बैठाओ. तुम हमारे लिए भांति-भांति के अन्नों में से उत्तम अन्न दो. हे
धनस्वामी इंद्र! धन के विषय में कोई भी हमसे आगे न निकल सके. (९)
इन्द्र मृळ मह्यं जीवातुमिच्छ चोदय धियमयसो न धाराम्.
यत्किञ्चाहं त्वायुरिदं वदामि तज्जुषस्व कृधि मा देववन्तम्.. (१०)
हे इंद्र! मुझे सुखी बनाओ, मेरे दीर्घ जीवन की इच्छा करो एवं मेरी बुद्धि को तलवार की
धार के समान तेज करो. तुम्हें अपना बनाने के लिए मैं जो कुछ कर रहा हूं, उसे समझो एवं
मुझे देवरूपी रक्षकों से युक्त करो. (१०)
त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रं हवेहवे सुहवं शूरमिन्द्रम्.
ह्वयामि शक्रं पुरुहूतमिन्द्रं स्वस्ति नो मघवा धात्विन्द्रः.. (११)
मैं शत्रुओं से रक्षा करने वाले तथा अभिलाषापूरक इंद्र को बुलाता हूं. मैं शोभन आह्वान
वाले एवं शूर इंद्र को बुलाता हूं. मैं सर्वकार्यसमर्थ एवं बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र को बुलाता
हूं. धनस्वामी इंद्र मुझे कल्याण दें. (११)
इन्द्रः सुत्रामा स्ववाँ अवोभिः सुमृळीको भवतु विश्ववेदाः.
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