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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 909 of 1855

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Page 909

प्राप्त करता है. विचित्र किरणों वाले अग्नि अपने अनोखे रक्षासाधनों द्वारा उसे गायों से भरी
गोशाला का उपभोग करने वाला बनाते हैं. (३)
आ यः पप्रौ जायमान उर्वी दूरेदृशा भासा कृष्णाध्वा.
अध बहु चित्तम ऊर्म्यायास्तिरः शोचिषा ददृशे पावकः.. (४)
काले मार्ग वाले अग्नि ने उत्पन्न होकर अपनी दूर से दिखने वाली ज्योति द्वारा धरती-
आकाश को भर दिया है. पवित्रकर्त्ता अग्नि रात्रि के महान् अंधकार को अपनी किरणों से
समाप्त करते हुए दिखाई देते हैं. (४)
नू नश्चित्रं पुरुवाजाभिरूती अग्ने रयिं मघवद्भ्यश्च धेहि.
ये राधसा श्रवसा चात्यन्यान्त्सुवीर्येभिश्चाभि सन्ति जनान्.. (५)
हे अग्नि! हम हव्यरूप अन्नधारियों को रक्षा साधनों एवं विविध अन्नों के साथ विचित्र
धन दो. हमें ऐसे पुत्र दो जो धन, अन्न एवं पराक्रम द्वारा दूसरों को पराजित कर सकें. (५)
इमं यज्ञं चनो धा अग्न उशन्यं त आसानो जुहुते हविष्मान्.
भरद्वाजेषु दधिषे सुवृक्तिमवीर्वाजस्य गध्यस्य सातौ.. (६)
हे अग्नि! हव्यधारी यजमान द्वारा बैठकर हवन किए यज्ञसाधन अन्न को स्वीकार करो
तथा भरद्वाजवंशीय ऋषियों के निर्दोष स्तोत्र स्वीकार करते हुए उन पर ऐसी कृपा करो,
जिससे वे विविध अन्न पा सकें. (६)
वि द्वेषांसीनुहि वर्धयेळां मदेम शतहिमाः सुवीराः.. (७)
हे अग्नि! शत्रुओं को विशेष रूप से नष्ट करो एवं हमारा अन्न बढ़ाओ. हम शोभन संतान
सहित सौ वर्ष तक प्रसन्न रहें. (७)
सूक्त—११ देवता—अग्नि
यजस्व होतरिषितो यजीयानग्ने बाधो मरुतां न प्रयुक्ति.
आ नो मित्रावरुणा नासत्या द्यावा होत्राय पृथिवी ववृत्याः.. (१)
हे देवों को बुलाने वाले एवं उत्तम यज्ञकर्त्ता अग्नि! तुम हमारे द्वारा प्रार्थित होकर इस
यज्ञ में शत्रुबाधक मरुतों के उद्देश्य से हवन करो तथा इस यज्ञ में मित्र, वरुण, अश्विनीकुमारों
एवं धरती-आकाश को अपने साथ लाओ. (१)
त्वं होता मन्द्रतमो नो अध्रुगन्तर्देवो विदथा मर्त्येषु.
पावकया जुह्वा३ वह्निरासाग्ने यजस्व तन्वं१ तव स्वाम्.. (२)
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