ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 908 of 1855
Read in contextध्रुवं ज्योतिर्निहितं दृशये कं मनो जविष्ठं पतयत्स्वन्तः.
विश्वे देवाः समनसः सकेता एकं क्रतुमभि वि यन्ति साधु.. (५)
वैश्वानर अग्नि की ध्रुव, मन की अपेक्षा भी तीव्रगामिनी एवं सुखों का मार्ग दिखाने वाली
ज्योति चलने वाले प्राणियों के भीतर छिपी है. सभी देव एक अभिलाषा एवं एक मत वाले
होकर यज्ञ के प्रधानकर्त्ता वैश्वानर के सामने जाते हैं. (५)
वि मे कर्णा पतयतो वि चक्षुर्वी३दं ज्योतिर्हृदय आहितं यत्.
वि मे मनश्चरति दूरआधीः किं स्विद्वक्ष्यामि किमु नू मनिष्ये.. (६)
वैश्वानर के विविध शब्द सुनने के लिए हमारे कान, रूप देखने के लिए आंखें व ज्योति
को समझने के लिए हमारी बुद्धि उत्सुक रहती है. हमारा मन वैश्वानर संबंधी चिंता से चंचल
रहता है. हम वैश्वानर के किस रूप को कहें अथवा मानें? (६)
विश्वे देवा अनमस्यन्भियानास्त्वामग्ने तमसि तस्थिवांसम्.
वैश्वानरोऽवतूतये नोऽमर्त्योऽवतूतये नः.. (७)
हे अंधकार में स्थित वैश्वानर अग्नि! अंधकार से डरते हुए सभी देव तुम्हें नमस्कार करते
हैं. मरणरहित वैश्वानर अपनी रक्षा द्वारा हमारी रक्षा करें. (७)
सूक्त—१० देवता—अग्नि
पुरो वो मन्द्रं दिव्यं सुवृक्तिं प्रयति यज्ञे अग्निमध्वरे दधिध्वम्.
पुर उक्थेभिः स हि नो विभावा स्वध्वरा करति जातवेदाः.. (१)
हे ऋत्विजो! तुम वर्तमान एवं बाधारहित यज्ञ में प्रसन्नताकारक दिव्य एवं दोषरहित
अग्नि को स्तोत्रपाठ करते हुए अपने सामने स्थापित करो, क्योंकि विशेष दीप्तिशाली अग्नि
हमारे यज्ञों को शोभन बनाते हैं. (१)
तमु द्युमः पुर्वणीक होतरग्ने अग्निभिर्मनुष इधानः.
स्तोमं यमस्मै ममतेव शूषं घृतं न शुचि मतयः पवन्ते.. (२)
हे दीप्तिमान्, देवों को बुलाने वाले एवं अनेक ज्वालाओं वाले अग्नि! तुम अन्य अग्नियों
के साथ प्रज्वलित होते हुए मनुष्यों के उस स्तोत्र को सुनो, जिसे स्तोता ममता नारी के समान
बोलते हैं एवं घी के समान तुम्हें भेंट करते हैं. (२)
पीपाय स श्रवसा मर्त्येषु यो अग्नये ददाश विप्र उक्थैः.
चित्राभिरूतिभिश्चित्रशोचिर्व्रजस्य साता गोमतो दधाति.. (३)
जो मेधावी यजमान स्तोत्रों के समान अग्नि को हव्य देता है. वह अन्न के द्वारा समृद्धि
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