ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextऋतमृतेन सपन्तेषिरं दक्षमाशाते. अद्रुहा देवौ वर्धेते.. (४)
मित्र व वरुण जल के द्वारा यज्ञ को सिंचित करते हुए प्रवृद्ध यजमान को घेरते हैं. हे
द्रोहरहित मित्र व वरुण! तुम दोनों बढ़ते हो. (४)
वृष्टिद्यावा रीत्यापेषस्पती दानुमत्या:. बृहन्तं गर्तमाशाते.. (५)
आकाश से जल बरसाने वाले, मनचाहा फल देने वाले, अन्न के स्वामी एवं दाता के प्रति
अनुकूल मित्र व वरुण यज्ञ में आने के लिए महान् रथ पर बैठते हैं. (५)
सूक्त—६९ देवता—मित्र व वरुण
त्री रोचना वरुण त्रीँरुत द्यून्त्रीणि मित्र धारयथो रजांसि.
वावृधानावामतिं क्षत्रियस्य़ानु व्रतं रक्षमाणावजुर्यम्.. (१)
हे मित्र व वरुण! तुम चमकते हुए तीन स्वर्गों, तीन अंतरिक्षों एवं तीन भूलोकों को
धारण करते हो एवं क्षत्रिय यजमान के रूप तथा कर्म की सदा रक्षा करते हो. (१)
इरावतीर्वरुण धेनवो वां मधुमद्द्वां सिन्धवो मित्र दुहे.
त्रयस्तस्थुर्वृषभासस्तिसृणां धिषणानां रेतोधा वि द्युमन्तः.. (२)
हे मित्र व वरुण! तुम्हारी आज्ञा से गाएं दुधारू होती हैं एवं नदियां मधुर जल देती हैं.
तुम्हारी कृपा से जल बरसाने वाले, जल धारण करने वाले एवं तेजस्वी अग्नि, वायु, आदित्य
देव धरती, आकाश एवं स्वर्ग के स्वामी बनते हैं. (२)
प्रातर्देवीमदितिं जोहवीमि मध्यन्दिन उदिता सूर्यस्य.
राये मित्रावरुणा सर्वतातॆळे तोकाय तनयाय शं योः.. (३)
हम ऋषि प्रातःकाल एवं माध्यंदिन यज्ञ के समय अदितिदेवी को बार-बार बुलाते हैं. हे
मित्र व वरुण! हम धन, पुत्र-पौत्र, सुख एवं शांति के लिए तुम दोनों की स्तुति करते हैं. (३)
या धर्तारा रजसो रोचनस्योतादित्या दिव्या पार्थिवस्य.
न वां देवा अमृता आ मिनन्ति व्रतानि मित्रावरुणा ध्रुवाणि.. (४)
हे दिव्य, अदितिपुत्र एवं स्वर्ग तथा भूलोक को धारण करने वाले मित्र व वरुण! हम
तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम्हारे ध्रुवकार्यों को मरणरहित इंद्र आदि देव भी नष्ट नहीं कर सकते
हैं. (४)
सूक्त—७० देवता—मित्र व वरुण
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