ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहे मानवरक्षक एवं शत्रुनाशक मित्र व वरुण! तुम कल्याणकारी एवं रमणीय यज्ञभूमि में
जब आते हो तो हमें सुख देते हो. (२)
विश्वे हि विश्ववेदसो वरुणो मित्रो अर्यमा.
व्रता पदेव सश्चिरे पान्ति मर्त्यं रिषः.. (३)
सब कुछ जानने वाले मित्र, वरुण, एवं अर्यमा अपने-अपने पद के अनुरूप हमारे यज्ञ में
सम्मिलित होते हैं एवं हिंसकों से भक्तों की रक्षा करते हैं. (३)
ते हि सत्या ऋतस्पृश ऋतावानो जनेजने.
सुनीथासः सुदानवाँऽहोश्चिद्रुरुचक्रयः.. (४)
सत्यफल देने वाले, जलवर्षक एवं यज्ञ के स्वामी मित्र व वरुण प्रत्येक यजमान को
सच्चा मार्ग दिखाते हैं, शोभन दान देते हैं एवं पापी स्तोता को भी विशाल धन देते हैं. (४)
को नु वां मित्रास्तुतो वरुणो वा तनूनाम्.
तत्सु वामेषते मतिरत्रिभ्य एषते मतिः.. (५)
हे मित्र एवं वरुण! तुम दोनों में कोई स्तुति न करने योग्य नहीं है. हम अत्रि गोत्रोत्पन्न
ऋषि तुम्हारी शरण जाते हैं. (५)
सूक्त—६८ देवता—मित्र व वरुण
प्र वो मित्राय गायत वरुणाय विपा गिरा.
महिक्षत्रावृतं बृहत्.. (१)
हे ऋत्विजो! तुम दूर तक फैलने वाली वाणी से मित्र और वरुण की स्तुति करो. हे
महाबली मित्र व वरुण! इस विशाल यज्ञ में आओ. (१)
सम्राजा या घृतयोनी मित्रश्चोभा वरुणश्च.
देवा देवेषु प्रशस्ता.. (२)
मित्र व वरुण सबके स्वामी, जल को जन्म देने वाले, दीप्तिशाली एवं देवों में प्रशंसनीय
हैं. (२)
ता नः शक्तं पार्थिवस्य महो रायो दिव्यस्य.
महि वां क्षत्रं देवेषु.. (३)
वे मित्र व वरुण हमें पार्थिव एवं दिव्य धन अधिक मात्रा में देने में समर्थ हैं. हे मित्र व
वरुण! तुम्हारा बल स्तुत्य एवं देवों में प्रसिद्ध है. (३)
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