ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextबैठते हैं, जैसे स्वर्ग में सूर्य विराजता है. (१२)
युवा स मारुतो गणस्त्वेषरथो अनेद्यः. शुभंयावाप्रतिष्कुतः.. (१३)
वे मरुद्गण युवक, तेजस्वी रथ वाले, निंदारहित, शोभनगति वाले एवं बाधारहित गति
वाले हैं. (१३)
को वेद नूनमेषां यत्रा मदन्ति धूतयः. ऋतजाता अरेपसः.. (१४)
मरुतों के उस स्थान को कौन जानता है, जहां शत्रुओं को भय से कंपित करने वाले,
यज्ञ के निमित्त उत्पन्न एवं पापरहित मरुत् प्रसन्न होते हैं. (१४)
यूयं मर्तं विपन्यवः प्रणेतार इत्था धिया. श्रोतारो यामहूतिषु.. (१५)
हे स्तुति की अभिलाषा करने वाले मरुतो! तुम यजमानों की स्तुति सुनकर उन्हें स्वर्ग
प्रदान करते हो एवं यज्ञों में उनका आह्वान सुनते हो. (१५)
ते नो वसूनि काम्या पुरुश्चन्द्रा रिशादसः. आ यज्ञियासो ववृत्तन.. (१६)
हे शत्रुनाशक, यज्ञ के पात्र एवं प्रमुदितकारक धन वाले मरुतो! तुम लोगों को मनचाहा
धन दो. (१६)
एतं मे स्तोममूर्ये दाभ्र्याय परा वह. गिरो देवि रथीरिव.. (१७)
हे रात्रिदेवी! तुम मेरी इस स्तुति को मेरे पास से रथवीति के पास ले जाओ. रथस्वामी
जिस प्रकार रथ पर सामान ले जाता है, उसी प्रकार तुम इन्हें पहुंचाओ. (१७)
उत मे वोचतादिति सुतसोमे रथवीतौ. न कामो अप वेति मे.. (१८)
हे रात्रिदेवी! सोमरस निचोड़ने वाले रथवीति से तुम यह कहना कि उसकी पुत्री के प्रति
मुझ श्यावाश्व का लगाव कम नहीं हुआ है. (१८)
एष क्षेति रथवीतिर्मघवा गोमतीरनु. पर्वतेष्वपश्रितः.. (१९)
वह धनवान् रथवीति गोमती के किनारे रहता है. उसका घर हिमालय के समीप है.
(१९)
सूक्त—६२ देवता—मित्र व वरुण
ऋतेन ऋतमपिहितं ध्रुवं वां सूर्यस्य यत्र विमुचन्त्यश्वान्.
दश शता सह तस्थुस्तदेकं देवानां श्रेष्ठं वपुषामपश्यम्.. (१)
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