Skip to content
SarvaKosh
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 861 of 1855

Read in context
Page 861

लिए सिरों पर पगड़ी रखते हो. सूर्य जिस प्रकार देखने में सहायक तेज फैलाते हैं, उसी प्रकार
तुम जल बरसाते हो. हे नेता मरुतो! तुम अश्वों के समान तेज चलने वाले एवं सुंदर तथा
यजमानों के समान यज्ञकार्य को जानने वाले हो. (३)
को वो महान्ति महतामुद्रश्वत्कस्काव्या मरुतः को ह पौंस्या.
यूयं ह भूमिं किरणं न रेजथ प्र यद्धरध्वे सुविताय दावने.. (४)
हे पूजायोग्य मरुतो! तुम्हारी पूजा कौन कर सकता है? तुम लोगों की स्तुतियां कौन पढ़
सकता है? तुम्हारे पौरुष का वर्णन कौन कर सकता है? जब तुम उत्तम जल का दान करने
के लिए वृष्टि करते हो तो धरती को किरण के समान कंपित बना देते हो. (४)
अश्वाइवेदरुषासः सबन्धवः शूराइव प्रयुधः प्रोत युयुधुः.
मयाईव सुवृधो वावृधुर्नरः सूर्यस्य चक्षुः प्र मिनन्ति वृष्टिभिः.. (५)
घोड़ों के समान तेज चलने वाले, तेजस्वी व समान बंधुता वाले मरुद्गण परस्पर प्रेम
करने वाले शूरों के समान युद्ध करते हैं. नेता मरुद्गण बुद्धिशाली मानवों के समान बढ़ते हैं
एवं वर्षा के द्वारा सूर्य के तेज को ढक लेते हैं. (५)
ते अज्येष्ठा अकनिष्ठास उद्भिदोऽमध्यमासो महसा वि वावृधुः.
सुजातासो जनुषा पृश्निमातरो दिवो मर्या आ नो अच्छा जिगातन.. (६)
शत्रुओं का नाश करने वाले मरुतों में न कोई छोटा है, न बड़ा है और न मध्यम है. वे
सभी तेज में बड़े हैं. हे शोभन-जन्म वाले, पृश्नि एवं मानव हितकारी मरुतो! तुम अपने
जन्मस्थान आकाश से हमारे सामने भली प्रकार आओ. (६)
वयो न ये श्रेणीः पप्तुरोजसान्तान्दिवो बृहतः सानुनस्परि.
अश्वास एषामुभये यथा विदुः प्र पर्वतस्य नभनूँरचुच्यवुः.. (७)
हे मरुतो! जिस तरह पंक्ति बनाकर उड़ने वाले पक्षी ऊंचे और विशाल पर्वत के ऊपर
बलपूर्वक उड़ते हुए समस्त आकाश में उड़ते हैं, उसी प्रकार तुम भी उड़ते हो. यह बात देवता
और मनुष्य दोनों ही जानते हैं कि तुम्हारे घोड़े बादलों से पानी गिराते हैं. (७)
मिमातु द्यौरदितिर्वीतये नः सं दानुचित्रा उषसो यतन्ताम्.
आचुच्युवुर्दिव्यं कोशमेत ऋषे रुद्रस्य मरुतो गृणानाः.. (८)
धरती और आकाश हमारी संख्या की वृद्धि के लिए वर्षा करें. विचित्र दान करने वाली
उषा हमारी भलाई के लिए यत्न करे. हे ऋषि! ये रुद्रपुत्र मरुद्गण तुम्हारी स्तुतियां स्वीकार
करके आकाश से वर्षा नीचे गिरावें. (८)
सूक्त—६० देवता—अग्नि एवं मरुत्
ebook converter DEMO Watermarks*