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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 821 of 1855

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Page 821

धन की रक्षा एवं अप्राप्त धन की प्राप्ति करता है, नित्य वर्तमान रात-दिन को जीतता है एवं
सूर्य तथा अग्नि का प्रिय बनता है. (५)
सूक्त—३८ देवता—इंद्र
उरोष्ट इन्द्र राधसो विभ्वी रातिः शतक्रतो.
अधा नो विश्वचर्षणे द्युम्ना सुक्षत्र मंहय.. (१)
हे शतक्रतु इंद्र! तुम्हारे विशाल धन का दान महान् है. हे सर्वद्रष्टा एवं शोभन धन वाले
इंद्र! हमें महान् धन प्रदान करो. (१)
यदीमिन्द्र श्रवाय्यमिषं शविष्ठ दधिषे.
पप्रथे दीर्घश्रुत्तमं हिरण्यवर्ण दुष्टरम्.. (२)
हे अतिशय बलवान् एवं हिरण्यवर्ण वाले इंद्र! यद्यपि तुम प्रचुर अन्न देते हो, फिर भी वह
सब जगह दुर्लभ कहा जाता है. (२)
शुष्मासो ये ते अद्रिवो मेहना केतसापः.
उभा देवावभिष्टये दिवश्च ग्मश्च राजथः.. (३)
हे वज्रधारी इंद्र! पूजनीय, प्रसिद्धकर्म वाले एवं तुम्हारे बलरूप मरुत् तथा तुम दोनों ही
धरती पर मनचाही गति के लिए समर्थ हो. (३)
उतो नो अस्य कस्य चिद्दक्षस्य तव वृत्रहन्.
अस्मभ्यं नृम्णामा भरास्मभ्यं नृमणस्यसे.. (४)
हे वृत्रनाशक इंद्र! हम तुम्हारे भक्त हैं. तुम हमें किसी दक्ष का धन लाकर देते हो. तुम
हम लोगों को धनी बनाना चाहते हो. (४)
नू त आभिरभिष्टिभिस्तव शर्मञ्छतक्रतो.
इन्द्र स्याम सुगोपाः शूर स्याम सुगोपाः.. (५)
हे शतक्रतु इंद्र! तुम्हारे पास पहुंचकर हम शीघ्र धनी बनें. हे शूर इंद्र! हम तुम्हारे द्वारा
सुरक्षित हों. (५)
सूक्त—३९ देवता—इंद्र
यदिन्द्र चित्र मेहनास्ति त्वादातमद्रिवः.
राधस्तन्नो विदद्वस उभयाहस्त्या भर.. (१)
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