ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextवही राजा भली प्रकार तृप्त होकर अपने घर में रहता है, धरती उसे सभी कालों में फलों
से बढ़ाती है एवं प्रजाएं अपने आप उसके सामने झुकी रहती हैं, जिस राजा के समीप ब्रह्मा
सबसे पहले जाते हैं. (८)
अप्रतीतो जयति सं धनानि प्रतिजन्यान्युत या सजन्या.
अवस्यवे यो वरिवः कृणोति ब्रह्मणे राजा तमवन्ति देवाः.. (९)
वह राजा बाधा के बिना शत्रुओं एवं अपनी प्रजाओं के धन पर अधिकार करके महान्
बनता है एवं देव उसी की रक्षा करते हैं, जो धनहीन एवं रक्षा के इच्छुक ब्राह्मण को धन देता
है. (९)
इन्द्रश्च सोमं पिबतं बृहस्पतेऽस्मिन्यज्ञे मन्दसाना वृषण्वसू.
आ वां विशन्त्विन्दवः स्वाभुवोऽस्मे रयिं सर्ववीरं नि यच्छतम्.. (१०)
हे बृहस्पति! तुम और इंद्र इस यज्ञ में प्रसन्न होकर यजमानों को धन दो एवं सोमरस
पिओ. संपूर्ण शरीर को व्याप्त करने में समर्थ सोम तुम्हारे शरीर में प्रवेश करे. तुम हमें पुत्र-
पौत्र युक्त धन प्रदान करो. (१०)
बृहस्पत इन्द्र वर्धतं नः सचा सा वां सुमतिर्भूत्वस्मे.
अविष्टं धियो जिगृतं पुरन्धीर्जस्तमर्यो वनुषामरातीः.. (११)
हे बृहस्पति और इंद्र! तुम हमें बढ़ाओ. हमारे प्रति तुम्हारी दया भावना एक ही साथ हो.
तुम हमारे यज्ञकर्म की रक्षा करो, हमारी बुद्धियों को जगाओ एवं हम यजमानों के शत्रुओं से
युद्ध करो. (११)
सूक्त—५१ देवता—उषा
इदमु त्यत्पुरुतमं पुरस्ताज्ज्योतिस्तमसो वयुनावदस्थात्.
नूनं दिवो दुहितरो विभातीर्गातुं कृणवन्नुषसो जनाय.. (१)
यह हमारे द्वारा स्तुति किया गया, सर्वप्रसिद्ध, परम विस्तृत एवं कांतियुक्त तेज पूर्व
दिशा में अंधकार से उदित हुआ था. निश्चय ही सूर्य की पुत्रीरूप एवं दीप्तिशालिनी उषाएं
यजमानों को गतिशील बनाने की सामर्थ्य रखती थीं. (१)
अस्थुरु चित्रा उषसः पुरस्तान्मिता इव स्वरवोऽध्वरेषु.
व्यु व्रजस्य तमसो द्वारोच्छन्तीरव्रञ्छुचयः पावकाः.. (२)
यज्ञों में गाड़े गए खंभों के समान सुंदर एवं रंग-बिरंगी उषाएं पूर्व दिशा को घेरकर स्थित
होती हैं. उषाएं बाधा डालने वाले अंधकार का द्वार खोलती हुई दीप्तियुक्त एवं पवित्र बनकर
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