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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 757 of 1855

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Page 757

हम हव्यदाताओं को दे दो. (४)
सूक्त—४८ देवता—वायु
विहि होत्रा अवीता विपो न रायो अर्यः.
वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये.. (१)
हे वायु! तुम शत्रुओं को भयकंपित करने वाले राजाओं के समान दूसरों द्वारा बिना
पिया हुआ सोम सबसे पहले पिओ एवं स्तुतिकर्त्ता को धनसंपन्न करो. हे वायु! तुम सोमरस
पीने के लिए प्रसन्नतादायक रथ द्वारा आओ. (१)
निर्यूवाणो अशस्तीर्नियुत्वाँ इन्द्रसारथिः.
वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये.. (२)
हे वायु! तुम सभी प्रशंसाओं से युक्त, घोड़ों के स्वामी एवं इंद्र के सहायक बनकर अपने
अन्नदाता रथ द्वारा सोम पीने हेतु आओ. (२)
अनु कृष्णे वसुधिती येमाते विश्वपेशसा.
वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये.. (३)
हे वायु! काले रंग वाले, धनों को धारण करने वाले एवं विश्वयुक्त धरती-आकाश तुम्हारे
पीछे चलते हैं. तुम आनंददायक रथ द्वारा सोम पीने हेतु आओ. (३)
वहन्तु त्वा मनोजुजो युक्तासो नवतिर्नव.
वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये.. (४)
हे वायु! मन के समान तीव्र गति वाले एवं एक-दूसरे से मिलकर चलने वाले निन्यानवे
घोड़े तुम्हें लाते हैं. हे वायु! तुम अपने आनंदप्रद रथ द्वारा सोम पीने के लिए आओ. (४)
वायो शतं हरीणां युवस्व पोष्याणाम्.
उत वा ते सहस्रिणो रथ आ यातु पाजसा.. (५)
हे वायु! तुम सौ स्वस्थ अश्वों को अपने रथ में जोड़ो अथवा हजार को. उनसे युक्त
तुम्हारा रथ शीघ्रता से आवे. (५)
सूक्त—४९ देवता—इंद्र, बृहस्पति
इदं वामास्ये हविः प्रियमिन्द्राबृहस्पती. उक्थं मदश्च शस्यते.. (१)
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