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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 756 of 1855

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Page 756

रथेन पृथुपाजसा दाश्वांसमुप गच्छतम्. इन्द्रवायू इहा गतम्.. (५)
हे इंद्र एवं वायु! तुम अधिक शक्तिशाली रथ द्वारा हव्य देने वाले यजमान के समीप
पहुंचने के लिए इस यज्ञ में आओ. (५)
इन्द्रवायू अयं सुतस्तं देवेभिः सजोषासा. पिबतं दाशुषो गृहे.. (६)
हे इंद्र और वायु! तुम दोनों अन्य देवों के साथ मैत्रीपूर्ण बनकर हव्य देने वाले यजमान
के घर में इस सोम को पिओ. (६)
इह प्रयाणमस्तु वामिन्द्रवायू विमोचनम्. इह वां सोमपीतये.. (७)
हे इंद्र और वायु! तुम यहां आओ और सोमरस पीने के लिए यहां अपने घोड़े रथ से
अलग करो. (७)
सूक्त—४७ देवता—इंद्र, वायु
वायो शुक्रो अयामि ते मध्वो अग्रं दिविष्टिषु.
आ याहि सोमपीतये स्पार्हो देव नियुत्वता.. (१)
हे वायु! मैं व्रतचर्यादि द्वारा पवित्र होकर सबसे पहले तुम्हारे निमित्त मधुर सोमरस लाता
हूं, क्योंकि मैं स्वर्ग में जाना चाहता हूं. हे अभिषवणीय देव! तुम अपने अश्वों द्वारा सोमपान
के लिए यहां आओ. (१)
इन्द्रश्च वायवेषां सोमानां पीतिमर्हथः.
युवां हि यन्तीन्दवो निम्नमापो न सध्र्यक्.. (२)
हे वायु! तुम और इंद्र इन सोमों को पीने की योग्यता रखते हो. इस तरह सोम तुम दोनों
के पास जाते हैं, जैसे जल नीचे स्थान की ओर चलता है. (२)
वायविन्द्रश्च शुष्मिणा सरथं शवसस्पती.
नियुत्वन्ता न ऊतय आ यातं सोमपीतये.. (३)
हे वायु! तुम और इंद्र बल के स्वामी हो एवं घोड़ों से युक्त एक ही रथ पर चढ़ते हो. हम
लोगों की रक्षा एवं सोमपान करने के लिए यहां आओ. (३)
या वां सन्ति पुरुस्पृहो नियुतो दाशुषे नरा.
अस्मे ता यज्ञवाहसेन्द्रवायू नि यच्छतम्.. (४)
हे नेता एवं यज्ञपूर्णकर्त्ता इंद्र व वायु! तुम्हारे पास बहुतों द्वारा अभिलषित अश्व हैं, उन्हें
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