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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 755 of 1855

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मंत्रयुक्त जल से हाथ धोने वाले, यज्ञकर्म के पूरक एवं सभी बातों को देखने वाले
अध्वर्यु पत्थरों की सहायता से जब सोमरस निचोड़ते हैं, तब उत्तम यज्ञ के साधन एवं
सोमयुक्त गार्हपत्य आदि अग्नि एक साथ रहने वाले अश्विनीकुमारों की प्रतिदिन स्तुति करते
हैं. (५)
आकेनिपासो अहभिर्द्विध्वतः स्वर्ष्ण शुक्रं तन्वतः आ रजः.
सूरश्चिदश्वान्युयुजान ईयते विश्वाँ अनु स्वधया चेतथस्पथः.. (६)
किरणें दिवस के द्वारा अंधकार को नष्ट करती हुई सूर्य के समान उज्ज्वल तेज का
विस्तार करती हैं. हे अश्विनीकुमारो! सूर्य अपने रथ में घोड़े जोड़कर चलते हैं. तुम दोनों
सोमरस लेकर चलते हुए उनका रास्ता बताओ. (६)
प्र वामवोचमश्विना धियन्धा रथः स्वश्वो अजरो यो अस्ति.
येन सद्यः परि रजांसि याथो हविष्मन्तं तरिणं भोजमच्छ.. (७)
हे अश्विनीकुमारो! यज्ञकर्म करने वाले हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम्हारा रथ शोभन
अश्वों वाला एवं नित्य तरुण है. उसके द्वारा तुम तुरंत तीनों लोकों में घूम आते हो. उसीसे तुम
हमारे हव्ययुक्त, शीघ्रगामी एवं भोजयुक्त यज्ञ में आओ. (७)
सूक्त—४६ देवता—वायु एवं इंद्र
अग्रं पिबा मधूनां सुतं वायो दिविष्टिषु. त्वं हि पूर्वपा असि.. (१)
हे वायु! स्वर्ग प्राप्त कराने वाले यज्ञों में तुम सबसे पहले निचोड़े हुए सोमरस को पिओ.
तुम सबसे पहले सोम पीने वाले हो. (१)
शतेना नो अभिष्टिभिर्नियुत्वाँ इन्द्रसारथिः. वायो सुतस्य तृम्पतम्.. (२)
हे वायु! तुम नियुत अर्थात् लोककल्याण वाले हो एवं इंद्र तुम्हारे सारथि हैं. तुम
अगणित अभिलाषाएं पूर्ण करने हेतु आओ एवं निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (२)
आ वां सहस्रं हरय इन्द्रवायू अभि प्रयः. वहन्तु सोमपीतये.. (३)
हे इंद्र एवं वायु! सोमरस पीने के लिए हजारों घोड़े तुम्हें यहां लावें. (३)
रथं हिरण्यवन्धुरमिन्द्रवायू स्वध्वरम्. आ हि स्थाथो दिविस्पृशम्.. (४)
हे इंद्र एवं वायु! तुम स्वर्णनिर्मित आसन वाले, शोभन-यज्ञ-युक्त एवं स्वर्ग को छूने वाले
रथ पर बैठो. (४)
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