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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 754 of 1855

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Page 754

उरुष्यतं जरितारं युवं ह श्रितः कामो नासत्या युवद्रिक्.. (७)
हे समान मन वाले अश्विनीकुमारो! हम जो स्तुति तुम्हारे समीप भेजते हैं, वह हमारे
लिए फल देने वाली हो. हे सुंदर अन्न वाले अश्विनीकुमारो! तुम स्तुति करने वाले की रक्षा
करो. हे नासत्यो! हमारी कामना तुम्हारे ही आश्रित है. (७)
सूक्त—४५ देवता—अश्विनीकुमार
एष स्य भानुरुदियर्ति युज्यते रथः परिज्मा दिवो अस्य सानवि.
पृक्षासो अस्मिन्मिथुना अधि त्रयो दृतिस्तुरीयो मधुनो वि रपशते.. (१)
यह सूर्य उदय होता है. तुम दोनों का रथ सभी ओर चलता है एवं चमकते हुए सूर्य के
साथ ऊंचे स्थान में पहुंचता है. इस रथ के ऊपरी भाग में तीन प्रकार का अन्न मिला हुआ है
तथा चौथी संख्या सोमरस से भरे हुए चमड़े के पात्र की है. (१)
उद्वां पृक्षासो मधुमन्त ईरते रथा अश्वास उषसो व्युष्टिषु.
अपोर्णुवन्तस्तम आ परीवृतं स्वर्णा शुक्लं तन्वन्त आ रजः.. (२)
तीन प्रकार के अन्न से युक्त, सोमरस-सहित एवं घोड़ों वाला तुम्हारा रथ उषा के
आरंभकाल में ही चारों ओर फैले हुए अंधकार को नष्ट करता हुआ एवं सूर्य के समान तेज
को फैलाता हुआ सामने की ओर जाता है. (२)
मध्वः पिबतं मधुपेभिरासभिरुत प्रियं मधुने युञ्जाथां रथम्.
आ वर्तनिं मधुना जिन्वथस्पथो दृतिं वहेथे मधुमन्तमश्विना.. (३)
तुम सोम पीने वाले मुखों से सोम पिओ. सोम पाने के लिए तुम अपना प्रिय रथ
अश्वयुक्त करके यजमान के घर तक लाओ. हे अश्विनीकुमारो! तुम सोमरसपूर्ण चमड़े का
पात्र धारण करके अपने मार्ग सोमरस द्वारा प्रसन्नतापूर्ण बनाओ. (३)
हंसासो ये वां मधुमन्तो अस्रिधो हिरण्यपर्णा उहुव उषर्बुधः.
उदप्रुतो मन्दिनो मन्दिनिस्पृशो मध्वो न मक्षः सवनानि गच्छथः.. (४)
तुम्हारे पास मार्ग में शीघ्र चलने वाले, माधुर्ययुक्त, द्रोह न करने वाले, सुनहरे रंग के
पंखों से युक्त, ढोने वाले, प्रातःकाल में जागने वाले, जल फैलाने वाले, प्रसन्नतादाता एवं सोम
का स्पर्श करने वाले घोड़े हैं. उन घोड़ों द्वारा तुम हमारे यज्ञों में उसी प्रकार आओ, जिस
प्रकार शहद की मक्खी शहद के पास जाती है. (४)
स्वध्वरासो मधुमन्तो अग्नय उस्रा जरन्ते प्रति वस्तोरश्विना.
यन्निहस्तस्तरणिर्विचक्षणः सोमं सुषाव मधुमन्तमद्रिभिः.. (५)
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