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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 753 of 1855

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Page 753

तं वां रथं वयमद्या हुवेम पृथुज्रयम्श्विना सङ्गतिं गोः.
यः सूर्या वहति वन्धुरायुर्र्गिर्वाहसं पुरुतमं वसूयुम्.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! हम तुम्हारे शीघ्र चलने वाले एवं गायों से मिलाने वाले रथ को
पुकारते हैं. वह रथ सूर्यकन्या को धारण करने वाला, बैठने के निमित्त काष्ठ आसन से युक्त,
स्तुतियां प्राप्त करने वाला एवं अधिक संपत्ति युक्त है. (१)
युवं श्रियमश्विना देवता तां दिवो नपाता वनथः शचीभिः.
युवोर्र्वपुरभि पृक्षः सचन्ते वहन्ति यत्ककुहासो रथे वाम्.. (२)
हे स्वर्गपुत्र अश्विनीकुमारो! तुम दोनों देव अपने कर्मों द्वारा प्रसिद्ध शोभा प्राप्त करते
हो. जब महान् अश्व तुम्हें रथ में ढोते हैं, तब सोमरस तुम्हारे शरीर को प्राप्त करता है. (२)
को वामद्या करते रातहव्य ऊतये वा सुतपेयाय वार्कैः.
ऋतस्य वा वनुषे पूर्य्याय नमो येमानो अश्विना ववर्त्तत्.. (३)
आज सोम देने वाला कौन सा यजमान अपनी रक्षा, सोमरसपान अथवा यज्ञ की पूर्ति
के लिए स्तुतियों द्वारा प्रशंसा करता है? हे अश्विनीकुमारो! नमस्कार करने वाला कौन व्यक्ति
तुम्हें अपने यज्ञ की ओर खींचता है? (३)
हिरण्ययेन पुरुभू रथेनेमं यज्ञं नासत्योप यातम्.
पिबाथ इन्मधुनः सोम्यस्य दधथो रत्नं विधते जनाय.. (४)
हे अनेक रूपधारी अश्विनीकुमारो! तुम दोनों अपने स्वर्णनिर्मित रथ द्वारा इस यज्ञ में
आओ, मधुर सोमरस पिओ एवं सेवा करने वाले यजमान को रमणीय धन दो. (४)
आ नो यातं दिवो अच्छा पृथिव्या हिरण्ययेन सुवृता रथेन.
मा वामन्ये नि यमन्देवयन्तः सं यद्ददे नाभिः पूर्व्या वाम्.. (५)
तुम दोनों स्वर्णनिर्मित एवं भलीप्रकार घूमने वाले रथ द्वारा स्वर्ग से हमारे पास आते हो.
तुम्हारी अभिलाषा करने वाले अन्य यजमान तुम्हें रोक न लें, इसीलिए हमने पहले तुम्हारी
स्तुति कर ली है. (५)
नू नो रयिं पुरुवीरं बृहन्तं दसा मिमाथामुभयेष्वस्मे.
नरो यद्वामश्विना स्तोममावन्सधस्तुतिमाजमीळहासो अगमन्.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! तुम अनेक पुत्र-पौत्रों से युक्त महान् धन शीघ्र दो. पुरुमीढ के
ऋत्विजों ने तुम्हारी स्तुति की है और अजमीढ के ऋत्विजों ने उसका साथ दिया है. (६)
इहेह यद्वां समना पपृक्षे सेयमस्मे सुमतिर्वाजरत्ना.
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