ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 747 of 1855
Read in contextसूक्त—४० देवता—दधिक्रा
दधिक्राव्ण इदु न चर्किक्राम विश्वा इन्मामुषसः सूदयन्तु.
अपामग्नेरुषसः सूर्यस्य बृहस्पतेराङ्गिरसस्य जिष्णोः.. (१)
हम दधिक्रा देव की शीघ्र स्तुति करते हैं. समस्त उषाएं हमें यज्ञकर्म की प्रेरणा दें. हम
जल, अग्नि, उषा, सूर्य, बृहस्पति एवं अंगिरापुत्र जिष्णु की स्तुति करेंगे. (१)
सत्वा भरिषो गविषो दुवन्यसच्छ्रवस्यादिष उषसस्तुरण्यसत्.
सत्यो द्रवो द्रवरः पतङ्गरो दधिक्रावेषमूर्जं स्वर्जनत्.. (२)
चलने वाले, भरणकुशल, गायों को प्रेरित करने वाले एवं सेवा के इच्छुकों में रहने वाले
दधिक्रा देव इच्छित उषाकाल में अन्न की कामना करें. शीघ्रता से चलने वाले, सत्यरूप से
चलने वाले, वेगशाली एवं उछल-उछल कर चलने वाले दधिक्रा देव अन्न, बल एवं स्वर्ग को
उत्पन्न करें. (२)
उत स्मास्य द्रवतस्तुरण्यतः पर्णं न वेरनु वाति प्रगर्धिनः.
श्येनस्येव ध्रजतो अङ्कसं परि दधिक्राव्णः सहोर्जा तरित्रतः.. (३)
जिस प्रकार पक्षीसमूह पक्षियों के पीछे-पीछे उड़ता है, उसी प्रकार वेगवान् लोग शीघ्र
चलने वाले एवं अधिक अभिलाषायुक्त दधिक्रा देव का अनुगमन करें. वे श्येन पक्षी के समान
तेज उड़ने वाले एवं रक्षक हैं. सब लोग अन्न की इच्छा से इनके साथ चलते हैं. (३)
उत स्य वाजी क्षिपणिं तुरण्यति ग्रीवायां बद्धो अपिकक्ष आसनि.
क्रतुं दधिक्रा अनु संतवीत्वत्पथामङ्कांस्यन्वापनीफणत्.. (४)
अश्वरूपी दधिक्रा देव ग्रीवा, कक्षा एवं मुख में बंधे होकर भी चलने के लिए शीघ्रता
करते हैं. ये अधिक बलशाली होकर यज्ञ की ओर जाने वाले टेढ़े रास्तों पर सब जगह शीघ्र
चलते हैं. (४)
हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्.
नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतम्.. (५)
सूर्य दीप्तिशाली आकाश में रहते हैं. वायु अंतरिक्ष में निवास करते हैं. होता वेदी पर
स्थित रहते हैं. अतिथि घर में निवास करते हैं. ऋत मनुष्यों में, उत्तम स्थान में, यज्ञ में एवं
आकाश में निवास करते हैं तथा जल, सूर्यकिरणों, सत्य एवं पर्वतों में उत्पन्न हुए हैं. (५)
सूक्त—४१ देवता—इंद्र एवं वरुण
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