ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 740 of 1855
Read in contextनिचोड़ा हुआ सोम पिया था. तुमने अपनी कुशलता एवं कर्म की इच्छा द्वारा एक चमस के
चार भाग कर दिए थे. (२)
व्यकृणोत चमसं चतुर्धा सखे वि शिक्षेत्यब्रवीत.
अथैत वाजा अमृतस्य पन्थां गणं देवानाम्भवः सुहस्ताः.. (३)
हे ऋभुओ! तुमने चमस के चार टुकड़े करके कहा था—“हे मित्र अग्नि! कृपा करो.”
अग्नि ने उत्तर दिया—“हे वाजगण एवं ऋभुओ! तुम कुशल लोग स्वर्ग के मार्ग से जाओ.”
(३)
किंमयः स्विच्चमस एष आस यं काव्येन चतुरो विचक्र.
अथा सुनुध्वं सवनं मदाय पात ऋभवो मधुनः सोम्यस्य.. (४)
वह चमस कैसा था, जिसे तुमने कुशलता से चार भागों में विभक्त किया था? हे
ऋत्विजो! ऋभुओं की प्रसन्नता के लिए सोम निचोड़ो. हे ऋभुओ! तुम मधुर सोमरस पिओ.
(४)
शच्याकर्त पितरा युवाना शच्याकर्त चमसं देवपानम्.
शच्या हरी धनुतरावतष्टेन्द्रवाहावृभवो वाजरत्नाः.. (५)
हे रमणीय सोम वाले ऋभुओ! तुमने अपने कर्म से माता-पिता को युवा बनाया था.
तुमने कर्मकौशल से ही चमस को चार भागों में बांटकर देवों के पीने योग्य बनाया था. अपनी
कुशलता से ही तुमने इंद्र को ढोने वाले दो शीघ्रगामी घोड़ों को बनाया था. (५)
यो वः सुनोत्यभिपित्वे अह्नां तीव्रं वाजासः सवनं मदाय.
तस्मै रयिमृभवः सर्ववीरमा तक्षत वृषणे मन्दसानाः.. (६)
हे अन्न के स्वामी एवं कामवर्षी ऋभुओ! दिन की समाप्ति पर जो यजमान तुम्हारी
प्रसन्नता के लिए तेज नशे वाला सोम निचोड़ता है, तुम प्रसन्न होकर उसे पुत्र-पौत्रों से युक्त
संपत्ति देते हो. (६)
प्रातः सुतमपिबो हर्यश्व माध्यन्दिनं सवनं केवलं ते.
समृभुभिः पिबस्व रत्नधेभिः सखीँयाँ इन्द्र चकृषे सुकृत्या.. (७)
हे हरि नामक अश्वों के स्वामी इंद्र! तुम प्रातःकाल निचोड़े गए सोम को पिओ. दोपहर
का यज्ञ तुम्हारा ही है. हे इंद्र! तुमने उत्तम कर्मों द्वारा जिन ऋभुओं को अपना मित्र बनाया है
उन रत्नदाता ऋभुओं के साथ तुम सोमपान करो. (७)
ये देवासो अभवता सुकृत्या श्येना इवेदधि दिवि निषेद.
ते रत्नं धात शवसो नपातः सौधन्वना अभवतामृतासः.. (८)
ebook converter DEMO Watermarks*