ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextजो धरती को जन्म देने वाले हैं अथवा जिस सत्य धर्म वाले ने स्वर्ग को उत्पन्न किया है
एवं जिन्होंने आनंदवर्धक विस्तृत जल को उत्पन्न किया है, वे हमारी हिंसा न करें. हम हव्य
द्वारा उन्हीं प्रजापति की सेवा करें. (९)
प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव.
यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (१०)
हे प्रजापति! तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा कोई भी इन समस्त उत्पन्न भूतों को अधीन नहीं
कर सका. हम जिस कामना से तुम्हारा हवन करते हैं, वह हमें प्राप्त हो तथा हम धनों के
स्वामी बनें. (१०)
सूक्त—१२२ देवता—अग्नि
वसुं न चित्रमहसं गृणीषे वामं शेवमतिथिमद्विषेण्यम्.
स रासते शुरुधो विश्वधायसोऽग्निर्होता गृहपतिः सुवीर्यम्.. (१)
मैं सूर्य के समान विचित्र तेज वाले, रमणीय, सुखकारक, अतिथि के समान पूज्य व
द्वेषरहित अग्नि की स्तुति करता हूं. अग्नि विश्व धारण करने वाली तथा शोकनाशिनी गाएं एवं
शोभन-वीर्य यजमानों को देते हैं. वे होता एवं गृहपति हैं. (१)
जुषाणो अग्ने प्रति हर्य मे वचो विश्वानि विद्वान् वयुनानि सुक्रतो.
घृतनिर्णिग्ब्रह्मणे गातुमेरय तव देवा अजनयन्ननु व्रतम्.. (२)
हे अग्नि! तुम तृप्त होकर मेरे स्तोत्र की कामना करो. हे उत्तम कर्म करने वाले अग्नि!
तुम सभी जानने योग्य बातें जानते हो, तुम घृत की आहुति पाकर स्तोता को सामगान की
आज्ञा दो. देवगण तुम्हारा कार्य देखकर अपना-अपना कर्त्तव्य करते हैं. (२)
सप्त धामानि परियन्नमर्त्यो दाशद्वाशुषे सुकृते मामहस्व.
सुवीरेण रयिणाग्ने स्वाभुवा यस्त आनट् समिधा तं जुषस्व.. (३)
हे सात स्थानों को व्याप्त करने वाले व मरणरहित अग्नि! तुम उत्तम दान करने वाले
एवं शोभन यज्ञकर्त्ता यजमान को धन दो. जो समिधा द्वारा तुम्हें बढ़ाता है, उसके पास उत्तम
संपत्ति एवं संतान लेकर जाओ. (३)
यज्ञस्य केतुं प्रथमं पुरोहितं हविष्मन्त ईळते सप्त वाजिनम्.
शृण्वन्तमग्निं घृतपृष्ठमुक्षणं पृणन्तं देवं पृणते सुवीर्यम्.. (४)
हव्य धारण करने वाले यजमान यज्ञ के ज्ञापक, देवों में प्रमुख, हितकारकों में श्रेष्ठ एवं
सात अश्वों के स्वामी अग्नि की स्तुति करते हैं. अग्नि घी की आहुति पाकर प्रार्थना सुनते हैं
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