ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहे अश्विनीकुमारो! तुम बैलों के समान स्वस्थ एवं सुखदाता तथा मित्र वरुण के समान
यथार्थ-दर्शी, सैकड़ों सुख देने एवं शीघ्र स्तुति पाने वाले हो. तुम घोड़ों के समान हव्य से पुष्ट
एवं सूर्यचंद्रमा के रूप में स्थित हो और मेढ़ों के समान भोज्य पदार्थ से पुष्ट अंग वाले बने हो.
(५)
सृण्येव जर्भरी तुर्फरीतू नैतोशेव तुर्फरी पर्फरीका.
उदन्यजेव जेमना मदेरू ता मे जराय्वजरं मरायु.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! तुम हाथी के अंकुश के समान लोगों को रोकने वाले एवं हनन करने
वाले हो. तुम वधिक के समान शत्रुहंता एवं असुरविनाशक हो. तुम जल में उत्पन्न पदार्थ के
समान उज्ज्वल व शक्तिशाली हो. तुम मरणधर्मा शरीर को यौवन दो. (६)
पज्रेव चर्चंरं जारं मरायु क्षद्मेवार्थेषु तर्तरीथ उग्रा.
ऋभू नापत्वखरमज्रा खरज्रुर्वायुर्न पर्फरत्क्षयद्रीयीणाम्.. (७)
हे शक्तिशाली अश्विनीकुमारो! तुम वीर पुरुषों के समान मेरे घूमने वाले वृद्धावस्था से
युक्त एवं मरणशील शरीर को विपत्तियों से उसी प्रकार पार करके अनुकूल स्थिति में
पहुंचाओ, जिस प्रकार जल नीचे स्थान की ओर बहता है. तुम्हें ऋभु के समान शीघ्रगामी रथ
मिला है. वायु के समान तेज चलने वाला तुम्हारा रथ उड़कर शत्रुओं का धन छीन लाया है.
(७)
घर्मेव मधु जठरे सनेरू भगेविता तुर्फरी फारिवारम्.
पतरेव चचरा चन्द्रनिर्णिङ्मनऋङ्गा मनन्या३ न जग्मी.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! तुम महान् वीरों के समान सोमरस अपने पेट में भरते हो. तुम धन के
रक्षक तथा शत्रुविदीर्णकारी आयुधों वाले हो. तुम पक्षियों के समान विचरण करने वाले,
चंद्रमा के समान सुंदर, इच्छा मात्र से सुशोभित होने वाले एवं प्रशंसनीय व्यक्तियों के समान
यज्ञ में जाने वाले हो. (८)
बृहन्तेव गम्भरेषु प्रतिष्ठां पादेव गाधं तरते विदाथ:.
कर्णेव शासुरनु हि स्मराथोंऽशेव नो भजतं चित्रमप्र:.. (९)
हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार लंबे पैर गहरे जल को पार करने में सहायता देते हैं, उसी
प्रकार तुम विपत्ति से पार होने में मुझे सहारा दो. तुम कानों के समान स्तोता की स्तुति सुनते
हो एवं यज्ञ के भागों के समान सुंदर यज्ञ में सम्मिलित होते हो. (९)
आरङ्गरेव मध्वेरयेथे सारघेव गवि नीचीनबारे.
कीनारेव स्वेदमासिष्विदाना क्षामेवोजां सूयवसात्सचेथे.. (१०)
हे अश्विनीकुमारो! गूंजती हुई मधुमक्खियां जिस प्रकार छत्ते में शहद भरती हैं, उसी
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