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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1739 of 1855

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Page 1739

हरे पत्थर अपने मुखों से देवों को बुलाते हैं. ये शोभन कर्म-वाले पत्थर यज्ञ को पाकर देवों
को बुलाने वाले अग्नि से पहले ही हव्य भक्षण करते हैं. (२)
एते वदन्त्यविदन्नना मधु न्यूङ्खयन्ते अधि पक्व आमिषि.
वृक्षस्य शाखामरुणस्य बप्सतस्ते सूभर्वा वृषभाः प्रेमराविषुः.. (३)
ये पत्थर लाल रंग के पेड़ की शाखा को खाने वाले सुभक्षण बैलों के समान शब्द करते
हैं. मांसभक्षी मांस पकने पर जैसी हर्षध्वनि करते हैं, उसी प्रकार का शब्द ये पत्थर नशीला
सोम सुख से पीते समय करते हैं. (३)
बृहद्वदन्ति मदिरेण मन्दिनेन्द्रं क्रोशन्तोऽविदन्नना मधु.
संरभ्या धीराः स्वसृभिरनर्तिपुराघोषयन्तः पृथिवीमुपब्दिभिः.. (४)
नशा करने वाले एवं निचोड़े जाते हुए सोम के द्वारा इंद्र को पुकारने वाले ये पत्थर
महान् शब्द करते हैं. ये पत्थर अपने मुख से नशीला सोमरस प्राप्त करते हैं. ये पत्थर
निचोड़ने के काम में चंचल होकर भी धीर रहते हैं एवं अपने शब्दों से धरती को गुंजित करते
हुए उंगलियों के साथ नाचते हैं. (४)
सुपर्णा वाचमक्रतोप द्यव्याखरे कृष्णा इषिरा अनर्तिषुः.
न्य१ङ्नि यन्त्युपरस्य निष्कृतं पुरू रेतो दधिरे सूर्यश्चितः.. (५)
इन पत्थरों का शब्द सुनकर ऐसा लगता है, जैसे आकाश में उड़ने वाले पक्षी शब्द कर
रहे हों. ये पत्थर जंगल में घूमने वाले कृष्णसार हरिण के समान नाचते हैं. ये पत्थर पिसे हुए
सोम को नीचे गिराते हैं एवं सूर्य के समान श्वेत वर्ण के जल को अधिक मात्रा में धारण करते
हैं. (५)
उग्राइव प्रवहन्तः समायमुः साकं युक्ता वृषणो बिभ्रतो धुरः.
यच्छ्वसन्तो जग्रसाना अराविषुः शृण्व एषां प्रोथथो अर्वतामिव.. (६)
जिस प्रकार शक्तिशाली घोड़े मिलकर रथ के जुए को धारण करके आगे बढ़ाते हैं एवं
अपना शरीर लंबा करते हैं. उसी प्रकार यज्ञ का भार वहन करने वाले ये पत्थर विशाल
बनकर सोमरस टपकाते हैं. ये सोमलता को कुचलने में नीचे-ऊपर होने के बहाने सांस लेते
हुए सोम को निगलते एवं शब्द करते हैं. घोड़े के मुख से निकले शब्द के समान मैं इन पत्थरों
का शब्द सुनता हूं. (६)
दशावनिभ्यो दशकक्ष्येभ्यो दशयोक्त्रेभ्यो दशयोजनेभ्यः.
दशाभीशुभ्यो अर्चताजरेभ्यो दश धुरो दश युक्ता वहद्भ्यः.. (७)
हे ऋत्विजो! सोमरस निचुड़ते समय दस उंगलियों द्वारा ग्रहण किए गए, दस उंगलियों
द्वारा प्रदर्शित, दस उंगलियों द्वारा बद्ध, दस उंगलियों रूपी लगामों से घोड़ों के समान
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