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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1718 of 1855

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Page 1718

अयोदंष्ट्रो अर्चिषा यातुधानानुप स्पृश जातवेदः समिद्धः.
आ जिह्वया मूरदेवान्रभस्व क्रव्यादो वृक्त्व्यपि धत्स्वास्न्.. (२)
हे जातवेद! तुम प्रज्वलित होकर एवं लोहे के समान तेज दांतों वाले बनकर अपनी
ज्वालाओं से राक्षसों को जलाओ. तुम अपनी जीभ के समान ज्वालाओं से हिंसक राक्षसों
को मारो एवं मांसभक्षी राक्षसों को काटकर अपने मुंह में रख लो (२)
उभोभयाविन्नुप धेहि दंष्ट्रा हिंस्रः शिशानोऽवरं परं च.
उतान्तरिक्षे परि याहि राजञ्जम्भैः सं धेह्यभि यातुधानान्.. (३)
हे दोनों जबड़ों में दांतों वाले एवं राक्षसहिंसक अग्नि! तुम अपनी दोनों ओर की दाढ़ें
तेज करते हुए वधयोग्य राक्षसों पर जमा दो. हे दीप्त अग्नि! तुम आकाश में स्थित राक्षसों के
समीप जाओ एवं अपने दांतों से भक्षण करो. (३)
यज्ञैरिषूः संनममानो अग्ने वाचा शल्यां अशनिभिर्दिहानः.
ताभिर्विध्य हृदये यातुधानान् प्रतीचो बाहूनप्रति भङ्ग्ध्येषाम्.. (४)
हे अग्नि! तुम हमारे यज्ञों और स्तुतियों के द्वारा बाणों को झुकाते हुए एवं उनके फलों
को वज्रों के द्वारा तेज करते हुए उन बाणों से राक्षसों के हृदयों को बेधो तथा उनकी भुजाओं
को तोड़ दो. (४)
अग्ने त्वचं यातुधानस्य भिन्धि हिंस्राशनिर्हरसा हन्त्वेनम्.
प्र पर्वाणि जातवेदः शृणीहि क्रव्यात्क्रविष्णुर्वि चिनोतु वृक्णम्.. (५)
हे जातवेद अग्नि! राक्षसों की खाल को काट डालो. हिंसक वज्र उन्हें ताप से मारे. तुम
राक्षसों के शरीर के भाग अलग-अलग कर दो. मांस की इच्छा करने वाले मांसाहारी जंतु
इनके छिन्न-भिन्न शरीरों को खावें. (५)
यत्रेदानिं पश्यसि जातवेदस्तिष्ठन्तमग्न उत वा चरन्तम्.
यद्वान्तरिक्षे पथिभिः पतन्तं तमस्ता विध्य शर्वा शिशानः.. (६)
हे जातवेद अग्नि! तुम राक्षस को खड़ा हुआ, घूमता हुआ, आकाश में स्थित, मार्ग में
चलता हुआ—किसी भी अवस्था में देखो तो बाण फेंककर उसे बेध दो. (६)
उतालब्धं स्पृणुहि जातवेद आलेभानादृष्टिभिर्यातुधानात्.
अग्ने पूर्वो नि जहि शोशुचान आमादः क्ष्वेङ्कास्तमदन्त्वेनीः.. (७)
हे जातवेद अग्नि! तुम मुझ स्तोता को आक्रमणकारी राक्षस के हाथ से अपनी ऋष्टियों
द्वारा बचाओ. तुम प्रमुख एवं प्रज्वलित होकर राक्षस को मारो. ये पक्षी उस राक्षस को खावें.
(७)
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