ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयज्ञशील प्रजाओं के समीप एवं स्तुतिकर्त्ता के ऋषियुक्त घर को जाते हो. (२)
अध्वर्युं वा मधुपाणिं सुहस्त्यमग्निधं वा धृतदक्षं दमूनसम्.
विप्रस्य वा यत्सवनानि गच्छथोऽत आ यातं मधुपयेमश्विना.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम मुझ हाथ में सोम धारण करने वाले, शोभनहस्त, शक्तिशाली,
दानेच्छुक एवं अग्नि का आधान करने वाले अध्वर्यु के पास आओ. यदि तुम किसी बुद्धिमान्
यजमान के यज्ञों में जा रहे हो, तब भी उन यज्ञों को छोड़ कर हमारा सोमरस पीने के लिए
आओ. (३)
सूक्त—४२ देवता—इंद्र
अस्तेव सु प्रतरं लायमस्यन्भूषन्निव प्र भरा स्तोममस्मै.
वाचा विप्रास्तरंत वाचमर्यो नि रामय जरितः सोम इन्द्रम्.. (१)
हे अंतरात्मा! धनुर्धारी जिस प्रकार सीने में घुसने वाला बाण छोड़ता है, उसी प्रकार तुम
इंद्र को सुशोभित करते हुए उसकी स्तुति करो. हे मेधावी स्तोताओ! तुम अपने स्तुतिवचन से
शत्रु की स्तुतियों को पराजित करो एवं सोमयज्ञ में इंद्र को आकर्षित करो. (१)
दोहेन गामुप शिक्षा सखायं प्र बोधय जरितर्जारमिन्द्रम्.
कोशं न पूर्णं वसुना न्युष्टमा च्यावय मघदेयाय शूरम्.. (२)
हे स्तोता! गाय जिस प्रकार दूध देती है, उसी प्रकार इंद्र अभिलाषा पूर्ण करते हैं. तुम
मित्र इंद्र को वश में करो एवं जारतुल्य इंद्र को जगाओ. लोग जिस प्रकार धन से भरे हुए पात्र
को उलटा करके उस में से भरा धन निकालते हैं, उसी प्रकार तुम धन देने के लिए शूर इंद्र को
अभिमुख करो. (२)
किमङ्ग त्वा मघवन्भोजमाहुः शिशीहि मा शिशयं त्वा शृणोमि.
अप्रस्वती मम धीरस्तु शक्र वसुविदं भगमिन्द्रा भरा नः.. (३)
हे धनस्वामी इंद्र! लोग तुम्हें स्तोताओं का इष्ट क्यों कहते हैं? मैंने तुम्हें दाता सुना है,
इसलिए तुम धन देकर स्तोता को संपन्न करो. हे शक्र! मेरी बुद्धि यज्ञकर्म में निपुण हो एवं
मेरा भाग्य धन प्राप्त कराने वाला बनाओ. (३)
त्वां जना ममसत्येष्विन्द्र सन्तस्थाना वि ह्वयन्ते समीके.
अत्रा युजं कृणुते यो हविष्मान्नास्रुन्वता सख्यं वष्टि शूरः.. (४)
हे इंद्र! लोग युद्धों में तुम्हें सहायता के लिए पुकारते हैं. युद्ध में शत्रुओं के साथ स्थित
लोग तुम्हें बुलाते हैं. इंद्र हव्य वाले आह्वदाता को अपना मित्र बनाते हैं एवं सोमरस न निचोड़ने