ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextशरीर के ऊपर वाले भाग से बालखिल्य आदि आठ ऋषि उत्पन्न हुए. भृगु आदि नौ ऋषि
प्रजापति के पिछले भाग से जन्मे. अंगिरा आदि ऋषियों की उत्पत्ति अग्रभाग से हुई. ये सब
ऋषि यज्ञांश का भाग करने वाले द्युलोक के ऊंचे भागों को बढ़ाते हैं. (१५)
दशानामेकं कपिलं समानं तं हिन्वन्ति क्रतवे पार्याय.
गर्भं माता सुधितं वक्षणास्ववेनन्तं तुषयन्ती बिभर्ति.. (१६)
अंगिरा आदि दस ऋषियों में प्रजापति के समान कपिल को यज्ञ पूर्ण करने की प्रेरणा
दी गई. संतुष्ट होकर प्रकृति माता ने प्रजापति द्वारा स्थापित गर्भ धारण किया. (१६)
पीवानं मेषमपचन्त वीरा न्युप्ता अक्षा अनु दीव आसन्.
द्वा धनुं बृहतीमप्स्र्वन्त: पवित्रवन्ता चरतः पुनन्ता.. (१७)
प्रजापति के पुत्र अंगिरा आदि ऋषियों ने मोटे बकरे को पकाया. जुआ खेलने के स्थान
में देवों के पासे फेंके गए. इन अंगिराओं में से दो धन के समान प्रसन्नता देने वाले कपिल को
लेकर मंत्र उच्चारण के साथ अपने शरीर को शुद्ध करने के लिए जल में घूमने लगे. (१७)
वि क्रोशनासो विष्वञ्च आयन्पचाति नेमो नहि पक्षदर्धः.
अयं मे देवः सविता तदाह द्रवन्न इद्धनवत्सर्पिरन्नः.. (१८)
अनेक प्रकार से प्रजापति को पुकारते हुए नाना गतियों वाले अंगिरा आए. उन में से
आधे ऋषि प्रजापति के लिए हव्य पकाते हैं, आधे नहीं पकाते. सूर्य देव ने यह बात मुझसे
कही है. काष्ठ एवं घी का भोजन करने वाले अग्नि प्रजापति को धारण करते हैं. (१८)
अपश्यं ग्रामं वहमानमारादचक्रया स्वधया वर्तमानम्.
सिषक्त्यर्थः प्र युगा जनानां सद्यः शिश्ना प्रमिनानो नवीयान्.. (१९)
मैंने देखा है कि प्रजापति दूर से प्राणियों का निर्माण करते हैं. वे चक्ररहित स्वधा के
द्वारा अपने आपको धारण करते हैं. स्वामी इंद्र यजमानों के यज्ञकालों का निर्माण करते हैं. वे
नवीन शरीर धारण करके शीघ्र ही शत्रुनाश करते हैं. (१९)
एतौ मे गावौ प्रमरस्य युक्तौ मो षु प्र सेधीर्मुहुरिन्ममन्धि.
आपश्चिद्दस्य वि नशन्त्यर्थं सूरश्च मर्क उपरो बभूवान्.. (२०)
मुझ शत्रुमारक इंद्र के रथ में जुड़े हुए दो सुपूजित एवं शत्रुओं के पास पहुंचने वाले हरि
नामक घोड़ों को मत रोको. बार-बार उनकी स्तुति करो. वर्षा का जल भी इंद्र की गति को
व्याप्त करता है. मेघ बिना किसी श्रम के उन स्थानों को पार कर जाते हैं. (२०)
अयं यो वज्रः पुरुधा विवृत्तोऽवः सूर्यस्य बृहतः पुरीषात्.
श्रव इदेना परो अन्यदस्ति तदव्यथी जरिमाणस्तरन्ति.. (२१)
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