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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1597 of 1855

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Page 1597

हे पूषा! बकरे तुम्हारे रथ की धुरी आगे खींचते हैं. तुम सभी याचकों के मित्र, बहुत
जन्म लेने वाले एवं अपने अधिकार से च्युत न होने वाले हो. (८)
अस्माकमूर्जा रथं पूषा अविष्टु माहिनः. भुवद्वाजानां वृध इमं न शृणवद्द्ववम्.. (९)
महान् पूषादेव अपने बल के द्वारा हमारे रथ की रक्षा करें, हमारे अन्नों को बढ़ावें और
हमारी इस पुकार को सुनें. (९)
सूक्त—२७ देवता—इंद्र
असत्सु मे जरितः साभिवेगो यत्सुन्वते यजमानाय शिक्षम्.
अनाशीर्दामहमस्मि प्रहन्ता सत्यधृतं वृजिनायन्तमाभुम्.. (१)
इंद्र ने कहा—“हे स्तोता! मेरी ऐसी शोभन मनोवृत्ति है कि मैं सोमरस निचोड़ने वाले
यजमान को मनचाहा फल देता हूं. जो मुझे हव्य नहीं देता, असत्य भाषण करता है एवं
पापकर्म करना चाहता है, उसे मैं पूरी तरह नष्ट कर देता हूं.” (१)
यदीदहं युधये संनयान्यदेवयून्तन्वा३ शूशुजानान्.
अमा ते तुम्रं वृषभं पचानि तीव्रं सुतं पञ्चदशं नि षिञ्चम्.. (२)
ऋषि ने कहा—“हे इंद्र! जिस समय मैं देवयज्ञ न करने वाले एवं केवल अपने शरीर को
पालने में लगे हुए लोगों से युद्ध करने जाता हूं. उस समय ऋत्विजों के साथ मिलकर बैल का
मांस पकाता हूं एवं पंद्रह दिनों में अर्थात् प्रतिदिन तेज नशे वाले सोमरस को तुम्हारे लिए देता
हूं.” (२)
नाहं तं वेद य इति ब्रवीत्यदेवयून्त्समरणे जघन्वान्.
यदावाख्यत्समरणमृघावदादिद्ध मे वृषभा प्र ब्रुवन्ति.. (३)
इंद्र ने कहा—“मैं ऐसे किसी व्यक्ति को नहीं जानता जो यह कहता हो कि मैंने देवयज्ञ
करने वालों को युद्ध में मारा है. मैं भयानक युद्ध में जाकर जब देवयज्ञ रहित लोगों का नाश
करता हूं, तब विद्वान् लोग मेरे उस वीरकर्म का विस्तार से वर्णन करते हैं.” (३)
यदज्ञातेषु वृजनेष्वासं विश्वे सतो मघवानो म आसन्.
जिनामि वेत्क्षेम आ सन्तमाभुं प्र तं क्षिणां पर्वते पादगृह्य.. (४)
“जिस समय मैं सहसा सामने आए युद्ध में सम्मिलित होता हूं, उस समय सारे ऋषि मेरे
आसपास बैठते हैं. मैं प्रजा के कल्याण के लिए उस चारों ओर घूमने वाले शत्रु को जीतता हूं
तथा उसके पैर पकड़कर उसे पर्वत के ऊपर फेंक देता हूं.” (४)
न वा उ मां वृजने वारयन्ते न पर्वतासो यदहं मनस्ये.
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