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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1594 of 1855

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Page 1594

हे दीप्तिशाली देवो! अपनी महत्ता से हमें उक्त दोनों कामों में संतुष्ट करो. (६)
सूक्त—२५ देवता—सोम
भद्रं नो अपि वातय मनो दक्षमुत क्रतुम्.
अधा ते सख्ये अन्धसो वि वो मदे रणन्गावो न यवसे विवक्षसे.. (१)
हे सोम! हमारे मन को प्रेरित करके कल्याणकारी, दक्ष एवं यज्ञकर्म करने वाला
बनाओ. तुम महान् हो, इसलिए तुम्हारा होने पर स्तोता तुम्हारी मित्रता में उसी प्रकार रमण
करे, जिस प्रकार गाएं घास के प्रति आनंदित होती हैं. (१)
हृदिस्पृशस्त आसते विश्वेषु सोम धामसु.
अधा कामा इमे मम वि वो मदे तिष्ठन्ते वसूयवो विवक्षसे.. (२)
हे सोम! स्तोता लोग अपनी स्तुतियों से तुम्हारे मन को हरते हुए सब स्थानों पर बैठते
हैं. तुम्हारा नशा हो जाने पर धन के इच्छुक मेरे मन में तरहतरह की अभिलाषाएं उत्पन्न होती
हैं, इसलिए तुम महान् हो. (२)
उत व्रतानि सोम ते प्राहं मिनामि पाक्या.
अधा पितेव सूनवे वि वो मदे मृळा नो अभि चिद्दधाद्विवक्षसे.. (३)
हे सोम! मैं अपनी परिपक्व बुद्धि से तुम्हारे यज्ञकर्मों का परिणाम देखता हूं. हे सोमरस!
तुम अपना नशा चढ़ने पर हमारे प्रति उसी प्रकार अनुकूल बनो, जिस प्रकार पिता पुत्र के
प्रति अनुकूल होता है. तुम शत्रुवध करके हमारी रक्षा करो, क्योंकि तुम महान् हो. (३)
समु प्र यन्ति धीतयः सर्गासोऽवताँ इव.
क्रतुं नः सोम जीवसे वि वो मदे धारया चमसाँ इव विवक्षसे.. (४)
हे सोम! कलश जल निकालने के लिए जैसे कुएं में जाता है, वैसे ही हमारी स्तुतियां
तुम्हारे पास जाती हैं. तुम महान् हो, इसलिए हमारे जीवन के निमित्त इस यज्ञ को इस प्रकार
धारण करो, जिस प्रकार लोग चमस को धारण करते हैं. (४)
तव त्ये सोम शक्तिभिर्नाकामासो वृण्विरे.
गृत्सस्य धीरास्तवसो वि वो मदे व्रजं गोमन्तमश्विनं विवक्षसे.. (५)
हे सोम! निश्चित अभिलाषाओं वाले धीर व्यक्तियों ने यज्ञकर्मों द्वारा तुम्हें संतुष्ट किया है.
तुम महान् एवं बुद्धिमान् हो. तुम सोमरस का नशा होने पर हमें गायों से युक्त गोशाला एवं
घोड़े दो, क्योंकि तुम महान् हो. (५)
पशुं नः सोम रक्षसि पुरुत्रा विष्ठितं जगत्.
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