ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextदीप्तिशाली इंद्र! हम बहिन-भाई की मित्रता के समान तुम्हारी अनुग्रह बुद्धि को जानते हैं.
हमारे लिए तुम्हारी मित्रता कल्याणकारक हो. (७)
सूक्त—२४ देवता—इंद्र व अश्विनीकुमार
इन्द्र सोममिमं पिब मधुमन्तं चमू सुतम्.
अस्मे रयिं नि धारय वि वो मदे सहस्रिणं पुरूवसो विवक्षसे.. (१)
हे इंद्र! पत्थरों से कुचलकर निचोड़ा हुआ यह मधुर सोमरस पिओ. हे अधिक धन वाले
तथा महान् इंद्र! सोमरस का अधिक नशा होने पर तुम हजारों धन दो. (१)
त्वां यज्ञेभिरुक्थैरुप हव्यभिरीमहे.
शचीपते शचीनां वि वो मदे श्रेष्ठं नो धेहि वार्यं विवक्षसे.. (२)
हे इंद्र! यज्ञों, स्तुतियों तथा हव्यों के द्वारा हम तुमसे अभिलषित धन मांगते हैं. हे
कर्मपालक इंद्र! तुम सभी कर्मों की रक्षा करते हो. तुम सोमरस का विशेष नशा चढ़ने पर हमें
उत्तम धन देकर महान् बनो. (२)
यस्पतिर्वार्याणामसि रध्रस्य चोदिता.
इन्द्र स्तोतॄणामविता वि वो मदे द्विषो नः पाह्यंहसो विवक्षसे.. (३)
हे इंद्र! तुम अभिलषित वस्तुओं के स्वामी एवं स्तोता को कर्म की प्रेरणा देने वाले हो. हे
इंद्र! तुम स्तोताओं के रक्षक हो. तुम सोमरस का विशेष मद होने पर शत्रुओं से हमारी रक्षा
करो और महान् बनो. (३)
युवं शक्रा मायाविना समीची निरमन्थतम्.
विमदेन यदीळिता नासत्या निरमन्थतम्.. (४)
हे शत्रुवधसमर्थ, बुद्धिमान् एवं परस्पर मिले हुए अश्विनीकुमारो! तुमने अरणिमंथन
करके अग्नि को उत्पन्न किया था. हे सत्य रूप अश्विनीकुमारो! विमद की स्तुति सुनकर तुमने
अरणि मथकर अग्नि जलाई. (४)
विश्वे देवा अकृपन्त समीच्योर्निष्पतन्त्योः. नासत्यावब्रुवन्देवाः पुनरा वहतादिति.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! मंथन के समय मिली हुई अरणियों से जब आग की चिनगारियां
निकलने लगीं तब सारे देवों ने तुम्हारी प्रशंसा की एवं कहा—“ऐसा दोबारा करो.” (५)
मधुमन्मे परायणं मधुमत्पुनरायनम्. ता नो देवा देवतया युवं मधुमतस्कृतम्.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! मेरा घर से बाहर निकलना और घर वापस आना प्रसन्नताकारक हो.
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