ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextकाममूता बह्वे३ तद्रपामि तन्वा मे तन्वं१ सं पिपृग्धि.. (११)
यमी कहने लगी- उस भाई के होने से क्या लाभ है, जिसके रहते हुए भी बहिन
पतिविहीन रहे. उस बहिन के होने से क्या लाभ है, जिसके होते हुए भाई दुःख उठाए. मैं
काममूर्च्छित होकर ये वचन बोल रही हूं. तुम मेरे शरीर से अपना शरीर भली-भांति मिलाओ.
(११)
न वा उ ते तन्वा तन्वं१ सं पपृच्यां पापमाहुर्यः स्वसारं निगच्छात्.
अन्येन मत्प्रमुदः कल्पयस्व न ते भ्राता सुभगे वष्ट्येतत्.. (१२)
यम कहने लगा- हे यमी! मैं तुम्हारे शरीर से अपना शरीर नहीं मिलाना चाहता. जो
अपनी बहिन के साथ संभोग करता है, उसे लोग पापी कहते हैं. हे सुंदरी! मेरे अतिरिक्त
किसी अन्य पुरुष के साथ आमोदप्रमोद करो. तुम्हारा भाई यह काम करना नहीं चाहता.
(१२)
बतो बतासि यम नैव ते मनो हृदयं चाविदाम.
अन्या किल त्वां कक्ष्येव युक्तं परि ष्वजाते लिबुजेव वृक्षम्.. (१३)
यमी बोली- मुझे खेद है कि तुम बहुत कमजोर हो. मैं तुम्हारे मन को नहीं समझ पा रही
हूं. रस्सी जिस प्रकार घोड़े को बांधती है और लता जिस प्रकार वृक्ष से लिपट जाती है, उसी
प्रकार अन्य स्त्री तुम्हारा आलिंगन करती है. (१३)
अन्यम् षु त्वं यम्यन्य उ त्वां परि ष्वजाते लिबुजेव वृक्षम्.
तस्य वा त्वं मन इच्छा स वा तवाधा कृणुष्व संविदं सुभद्राम्.. (१४)
यम ने कहा- हे यमी! लता जिस प्रकार वृक्ष को लपेटती है, उसी प्रकार तुम मेरे
अतिरिक्त अन्य पुरुष का आलिंगन करो. वह पुरुष भी तुम्हारा आलिंगन करे. तुम उस पुरुष
का मन जीतने की कामना करो और वह पुरुष तुम्हारा मन जीतने की इच्छा करे. तुम उसी के
साथ कल्याणकारी सहवास करो. (१४)
सूक्त—११ देवता—अग्नि
वृषा वृष्णे दुदुहे दोहसा दिवः पयांसि यह्वो अदितेरदाभ्यः.
विश्वं स वेद वरुणो यथा धिया स यज्ञियो यजतु यज्ञियाँ ऋतून्.. (१)
वर्षा करने वाले, महान् और अपराजेय अग्नि ने हवि बरसाने वाले यजमान के लिए
दोहन क्रिया द्वारा आकाश से जल गिराया. वरुण अपनी बुद्धि से सारे संसार को जानते हैं.
यज्ञयोग्य अग्नि अनुकूल ऋतुओं में यज्ञ करें. (१)
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