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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1567 of 1855

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Page 1567

पति-पत्नी बना दिया था. प्रजापति के काम का कोई भी विरोध नहीं करता है. हमारे दंपती
होने की बात द्यावा-पृथिवी जानते हैं. (५)
को अस्य वेद प्रथमस्याह्नः क ईं ददर्श क इह प्र वोचत्.
बृहन्मित्रस्य वरुणस्य धाम कदु ब्रव आहनो वीच्या नॄन्.. (६)
यमी बोली- पहले दिन के संभोग को कौन जानता है! उसे किसने देखा है? उसे कौन
बताएगा? हे मोक्ष और बंधन का निर्णय करने वाले यम! तुम मित्र और वरुण के स्थान
अर्थात् दिन-रात के विषय में क्या कहते हो. (६)
यमस्य मा यम्यं१ काम आगन्त्समाने योनौ सहशेय्याय.
जायेव पत्ये तन्वं रिरिच्यां वि चिद्वृहेव रथ्येव चक्रा.. (७)
तुझ यम की अभिलाषा मुझ यमी के प्रति जागृत हो. एक ही शय्या पर साथ-साथ सोने
के लिए पत्नी जिस प्रकार पति के सामने अपना शरीर प्रदर्शित करती है, उसी प्रकार मैं
अपना शरीर प्रकाशित करूंगी. आओ, हम दोनों रथ के दो पहियों के समान एक ही कार्य में
लगें. (७)
न तिष्ठन्ति न नि मिषन्त्येते देवानां स्पश इह ये चरन्ति.
अन्येन मदाहनो याहि तूयं तेन वि वृह रथ्येव चक्रा.. (८)
यम ने कहा- यहां जो देवों के गुप्तचर घूमते हैं, वे न कभी रुकते हैं और न आंखें बंद
करते हैं. हे दुःख देने वाली यमी! तुम मेरे अतिरिक्त किसी अन्य के पास शीघ्र जाओ एवं रथ
के पहियों के समान एक रुचिवाला कार्य करो. (८)
रात्रीभिरस्मा अहभिर्दशस्येत्सूर्यस्य चक्षुर्मुहुरुन्मिमीयात्.
दिवा पृथिव्या मिथुना सबन्धू यमीर्यमस्य बिभृयादजामि.. (९)
सभी यजमान रात और दिन का कल्पित भाग यम को दें. सूर्य का तेज यम के लिए
बार-बार उदित हो. आपस में संबंध रखने वाले रात-दिन द्यावा और पृथिवी के साथ यम के
बंधु हैं. यमी अपने भाई यम के अतिरिक्त किसी अन्य को अपना बनावें. (९)
आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृणवन्नजामि.
उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्.. (१०)
आगे चलकर ऐसा समय आएगा, जब बहिनें अपने भाई के अतिरिक्त किसी अन्य
व्यक्ति को पति बनावेंगी. हे सुंदरी! मेरे अतिरिक्त किसी अन्य को पति बनाने की कल्पना
करो और अपनी भुजा को वीर्याधान करने वाले उस पुरुष का उपधान बनाओ. (१०)
किं भ्रातासद्यदनाथं भवाति किमु स्वसा यन्निर्ऋतिर्निगच्छात्.
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