ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextमृजन्ति त्वा समग्रुवोऽव्ये जीरावधि ष्वणि. रेभो यदज्यसे वने.. (९)
हे सोम! जब तुम शब्द करते हुए जल में मिलते हो, तब हम अधिक शब्द करते हुए एवं
भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर तुम्हें निचोड़ते हैं. (९)
पवमानस्य ते कवे वाजिन्सर्गा असृक्षत. अर्वन्तो न श्रवस्यवः.. (१०)
हे क्रांत बुद्धि वाले एवं अन्नयुक्त सोम! जब तुम दशापवित्र से छनते हो, तब यजमानों
के लिए अन्न लाने की इच्छुक तुम्हारी धाराएं घोड़ों के समान दौड़ती हैं. (१०)
अच्छा कोशं मधुश्रुतमसृग्रं वारे अव्यये. अवावशन्त धीतयः.. (११)
ऋत्विजों द्वारा मधुर रस टपकाने वाले सोम द्रोणकलश में जाने के लिए सदा दशापवित्र
पर गिराए जाते हैं. हमारी उंगलियां सोम को बार-बार मसलना चाहती हैं. (११)
अच्छा समुद्रमिन्दवोऽस्तं गावो न धेनवः. अग्मन्नृतस्य योनिमा.. (१२)
जिस प्रकार नई ब्याई हुई गाएं दूध देकर गोशाला की ओर जाती हैं, उसी प्रकार सोम
द्रोणकलश एवं यज्ञशाला की ओर जाते हैं. (१२)
प्र ण इन्दो महे रण आपो अर्षन्ति सिन्धवः. यद् गोभिर्वासयिष्यसे.. (१३)
हे सोम! जब तुम्हें गाय के दूध, दही आदि में मिलाया जाता है तब जल हमारे विशाल
यज्ञ की ओर आते हैं. (१३)
अस्य ते सख्ये वयमियक्षन्तस्त्वोतयः. इन्दो सखित्वमुश्मसि.. (१४)
हे सोम! तुम्हारी पूजा के अभिलाषी एवं तुम्हारे मैत्रीकर्म में स्थित हम लोग तुम्हारा
सख्य चाहते हैं. (१४)
आ पवस्व गविष्टये महे सोम नृचक्षसे. इन्द्रस्य जठरे विश.. (१५)
हे सोम! तुम अंगिरागोत्रीय ऋषियों की गाएं खोजने वाले, महान् तथा मानवों का
कर्मफल देखने वाले इंद्र के लिए शुद्ध बनो एवं इंद्र के उदर में प्रवेश करो. (१५)
महाँ असि सोम ज्येष्ठ उग्राणामिन्द ओजिष्ठः. युध्वा सञ्छश्वज्जगेथ.. (१६)
हे सोम! तुम महान्, देवों को प्रसन्न करने वाले एवं परम प्रशंसनीय हो. हे पवमान सोम!
तुम उग्र बल वाले लोगों में अतिशय ओजस्वी हो. तुमने शत्रुओं के साथ युद्ध करते हुए उनका
धन जीत लिया था. (१६)
य उग्रेभ्यश्चिदोजियाञ्छूरेभ्यश्चिच्छूरतरः. भूरिदाभ्यश्चिन्मंहीयान्.. (१७)
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