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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1409 of 1855

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Page 1409

परि दिव्यानि मर्मृशद्विश्नानि सोम पार्थिवा. वसूनि याह्यस्मयुः.. (८)
हे सोम! तुम स्वर्गीय एवं पार्थिव सभी प्रकार के धनों का स्पर्श करते हुए हमारे
अभिलाषी बनकर आओ. (८)
सूक्त—१५ देवता—सोम
एष धिया यात्यण्व्या शूरो रथेभिराशुभिः. गच्छन्निन्द्रस्य निष्कृतम्.. (१)
उंगलियों द्वारा निचोड़े हुए ये शूर सोम यज्ञ के द्वारा शीघ्रगामी रथ में बैठकर इंद्र के
बनाए हुए स्वर्ग में जाते हैं. (१)
एष पुरू धियायते बृहते देवतातये. यत्रामृतास आसते.. (२)
जिस विशाल यज्ञ में देवगण बैठते हैं, उस में सोम बहुत से कर्मों की इच्छा करते हैं. (२)
एष हितो वि नीयतेऽन्तः शुभ्रावता पथा. यदी तुञ्जन्ति भूर्णयः.. (३)
हविर्धान में स्थापित सोम आहवानीय देश की ओर ले जाए जाते हैं. इस समय अध्वर्यु
आदि शोभा वाले मार्ग से उन्हें देवों को देते हैं. (३)
एष शृङ्गाणि दोधुवच्छिशीते यूथ्यो३ वृषा. नृम्णा दधान ओजसा.. (४)
शक्ति द्वारा हमारे लिए धन धारण करने वाले सोम अपने ऊपर वाले भागों को इस
प्रकार कंपाते हैं, जैसे शक्तिशाली सांड़ अपने सींग हिलाता है. (४)
एष रुक्मिभिरीयते वाजी शुभ्रेभिरंशुभिः. पतिः सिन्धूनां भवन्.. (५)
वेगशाली एवं दीप्त किरणों से युक्त सोम सभी बहने वाले रसों के स्वामी के रूप में
अध्वर्यु आदि के साथ जाते हैं. (५)
एष वसूनि पिब्दना परुषा ययिवाँ अति. अव शादेषु गच्छति.. (६)
ये सोम ढकने वाले एवं पीड़ित करने वाले राक्षसों को अपने अंशों द्वारा लांघ कर जाते
हैं. (६)
एतं मृजन्ति मर्ज्यमुप द्रोणेष्वायवः. प्रचक्राणं महीरिषः.. (७)
ऋत्विज् अधिक रस टपकाने वाले सोम को द्रोणकलशों में निचोड़ते हैं. (७)
एतमु त्यं दश क्षिपो मृजन्ति सप्त धीत्तयः. स्वायुधं मदिन्तमम्.. (८)
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