ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1397 of 1855
Read in contextसना ज्योतिः सना स्व१र्विश्वा च सोम सौभगा. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (२)
हे सोम! हमें ज्योति, स्वर्ग, समस्त-सौभाग्य एवं कल्याण दो. (२)
सना दक्षमृत क्रतुमप सोम मृधो जहि. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (३)
हे सोम! हमें बल एवं ज्ञान दो. शत्रुओं को मारो तथा हमें सौभाग्य दो. (३)
पवीतारः पुनीतन सोममिन्द्राय पातवे. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (४)
हे सोमरस निचोड़ने वालो! इंद्र के पीने के लिए सोमरस निचोड़ो एवं हमारे लिए
कल्याण प्रदान करो. (४)
त्वं सूर्ये न आ भज तव क्रत्वा तवोतिभिः. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (५)
हे सोम! अपने कार्यों एवं रक्षणों द्वारा तुम हमें सूर्य के समीप पहुंचाओ एवं हमें मंगल
प्रदान करो. (५)
तव क्रत्वा तवोतिभिर्ज्योक्पश्येम सूर्यम्. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (६)
हे सोम! हम तुम्हारे यज्ञों एवं रक्षाओं के कारण चिरकाल तक सूर्य को देखें. तुम हमारा
कल्याण करो. (६)
अभ्यर्ष स्वायुध सोम द्विबर्हसं रयिम्. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (७)
हे शोभन आयुधों वाले सोम! तुम द्युलोक एवं धरती पर बढ़ने वाला धन हमें दो एवं
हमारा कल्याण करो. (७)
अभ्य१र्षणपच्युतो रयिं समत्सु सासहिः. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (८)
हे संग्रामों में शत्रुओं द्वारा अपराजित तथा शत्रुपराभवकारी सोम! तुम हमें धन दो तथा
हमारा कल्याण करो. (८)
त्वां यज्ञैरवीवृधन् पवमान विधर्मणि. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (९)
हे पवमान सोम! लोगों ने अपनी वृद्धि के लिए तुम्हें यज्ञों के द्वारा बढ़ाया था. तुम हमें
कल्याण दो. (९)
रयिं नश्चित्रमश्विनमिन्दो विश्वायुमा भर. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (१०)
हे सोम! तुम हमें घोड़ों के समान सर्वत्र जाने वाला तथा विचित्र धन दो एवं हमारा
कल्याण करो. (१०)
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