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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1392 of 1855

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Page 1392

स्तुति करो. (१०)
उदिता यो निदिता वेदिता वस्वा यज्ञियो ववर्त्तति.
दुष्टरा यस्य प्रवणे नोर्मयो धिया वाजं सिषासतः.. (११)
हे स्तोता! जो जानने वाले व यज्ञयोग्य अग्नि उत्पन्न एवं प्रसिद्ध धनों को लाते हैं, जो
कर्म द्वारा युद्ध की इच्छा करते हैं एवं जिस अग्नि की ज्वालाएं नीचे मुख करके बहने वाली
सागर तरंगों के समान कठिनाई से पार की जा सकती हैं, उसी अग्नि की स्तुति करो. (११)
मा नो हृणीतामतिथिर्वसुरग्निः पुरुप्रशसत एषः. यः सुहोता स्वध्वरः.. (१२)
निवासस्थान देने वाले, अतिथि, अनेक जनों द्वारा स्तुत, देवों के शोभन आह्वानकर्त्ता व
शोभन-यज्ञ वाले अग्नि को हमारे पास आने से कोई भी न रोके. (१२)
मो ते रिषण्ये अच्छोक्तिभिर्वसोऽग्ने केभिश्चिद्देवैः.
कीरिश्चिद्धि त्वामीट्टे दूत्याय रातहव्यः स्वध्वरः.. (१३)
हे निवासस्थान देने वाले अग्नि! जो स्तोता स्तुतियों एवं सुखकर अनुगमनों द्वारा तुम्हारी
सेवा करते हैं, उनकी कोई हिंसा न करे. हव्य देने वाला स्तोता भी हव्यवहन आदि दूतकर्म के
लिए तुम्हारी स्तुति करता है. (१३)
आग्ने याहि मरुत्सखा रुद्रेभिः सोमपीतये.
सोभर्या उप सुष्टुतिं मादयस्व स्वर्णरे.. (१४)
हे मरुतों के सखा अग्नि! तुम हमारे शोभन यज्ञ में रुद्रपुत्र मरुतों के साथ सोमरस पीने
के लिए आओ. तुम मुझ सौभरि ऋषि की शोभन-स्तुति के समीप आओ एवं सोमरस पीकर
प्रसन्न बनो. (१४)