ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextप्र यं राये निनीषसि मर्तो यस्ते वसो दाशत्.
स वीरं धत्ते अग्न उक्थशंसिनं त्मना सहस्रपोषिणम्.. (४)
हे निवासस्थान देने वाले अग्नि! तुम अपने जिस स्तोता को धन देने के हेतु सबका नेता
बनाना चाहते हो, एवं जो स्तोता तुम्हारे लिए हव्य देता है, वह अपने आप ही उक्थमंत्रों का
बोलने वाला, हजारों का पोषण करने वाला एवं वीर पुत्र प्राप्त करता है. (४)
स दृळ्हे चिदभि तृणत्ति वाजमर्वता स धत्ते अक्षिति श्रवः.
त्वे देवत्रा सदा पुरूवसो विश्वा वामानि धीमहि.. (५)
हे विशाल धन वाले अग्नि! जो यजमान तुम्हें हव्य देता है, वह शत्रु की दृढ़ नगरी में भी
स्थित अन्न को अपने घोड़ों द्वारा नष्ट करता है तथा क्षीण न होने वाला अन्न धारण करता है.
हम भी तुम में स्थित सभी उत्तम धनों को प्राप्त करेंगे. (५)
यो विश्वा दयते वसु होता मन्द्रो जनानाम्.
मधोर्न पात्रा प्रथमान्यस्मै प्र स्तोमा यन्त्यग्नये.. (६)
देवों को बुलाने वाले व प्रसन्न, जो अग्नि मनुष्यों को अन्न देते हैं, उन्हीं अग्नि को नशीले
सोमरस के प्रथम पात्र प्राप्त होते हैं. (६)
अश्वं न गीर्भी रथ्यं सुदानवो मर्मृज्यन्ते देवयवः.
उभे तोके तनये दस्म विशपते पर्षि राधो मघोनाम्.. (७)
हे दर्शनीय एवं प्रजाओं के पालक अग्नि! शोभनदान वाले एवं देवों की अभिलाषा करने
वाले यजमान स्तुतियों द्वारा उसी प्रकार तुम्हारी सेवा करते हैं, जिस प्रकार रथ खींचने वाले
घोड़े की सेवा की जाती है. तुम यजमानों के पुत्रों और पौत्रों को धन वालों का धन दो. (७)
प्र मंहिष्ठाय गायत ऋताव्ने बृहते शुक्रशोचिषे. उपस्तुतासो अग्नये.. (८)
हे स्तोताओ! तुम दाताओं में श्रेष्ठ, यज्ञस्वामी, महान् व दीप्त तेज वाले अग्नि की स्तुति
करो. (८)
आ वंसते मघवा वीरवद्यशः समिद्धो द्युम्न्याहुतः.
कुविन्नो अस्य सुमतिर्नवीयस्यच्छा वाजेभिरागमत्.. (९)
धन वाले व यशस्वी अग्नि यजमानों को यश देने वाला अन्न प्रदान करते हैं. इन अग्नि
की नवीनतम अनुग्रहबुद्धि अन्नों के साथ हमारे पास बहुत बार आवे. (९)
प्रेष्ठमु प्रियार्णा स्तुह्यासावातिथिम्. अग्निं रथानां यमम्.. (१०)
हे स्तोता! प्रियों में अतिशय प्रिय, अतिथि एवं रथों का नियमन करने वाले अग्नि की
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