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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1376 of 1855

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Page 1376

अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः.
आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त .. (१३)
शीघ्रगति वाला एवं दस हजार सेनाओं को साथ लेकर चलने वाला कृष्ण नामक असुर
अंशुमती नदी के किनारे रहता था. इंद्र ने उस चिल्लाने वाले असुर को अपनी बुद्धि से खोजा
एवं मानव-हित के लिए उसकी वधकारिणी सेनाओं का नाश किया. (१३)
द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः.
नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृष्णो युध्यताजौ.. (१४)
इंद्र ने कहा— “मैंने अंशुमती नदी के किनारे गुफा में घूमने वाले कृष्ण असुर को देखा
है. वह दीप्तिशाली सूर्य के समान जल में स्थित है. हे अभिलाषापूरक मरुतो! मैं युद्ध के लिए
तुम्हें चाहता हूं. तुम युद्ध में उसे मारो.” (१४)
अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः.
विशो अदेवीर्अभ्या३ चरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे.. (१५)
तेज चलने वाला कृष्ण असुर अंशुमती नदी के किनारे दीप्तिशाली बनकर रहता था।
इंद्र ने बृहस्पति की सहायता से काली एवं आक्रमण हेतु आती हुई सेनाओं का वध किया.
(१५)
त्वं ह त्यत्सप्तभ्यो जायमानोऽशत्रुभ्यो अभवः शत्रुरिन्द्र.
गूह्ळे द्यावापृथिवी अन्वविन्दो विभुमद्भ्यो भुवनेभ्यो रणं धाः.. (१६)
हे इंद्र! वह कार्य तुम्हीं ने किया था. तुम्हीं जन्म लेकर सात शत्रुओं को नष्ट करने वाले
बने थे. तुमने अंधकारपूर्ण द्यावा-पृथिवी को प्राप्त किया था. तुमने महान् भवनों के लिए
आनंद दिया था. (१६)
त्वं ह त्यदप्रतिमानमोजो वज्रेण वज्रिन्धृषितो जघन्थ.
त्वं शुष्णस्यावातिरो वधत्रैस्त्वं गा इन्द्र शच्येदाविन्दः.. (१७)
हे वज्रधारी इंद्र! तुमने वह कार्य किया है. तुमने अद्वितीय योद्धा बनकर अपने वज्र से
शुष्ण का बल नष्ट किया था. तुमने अपने आयुधों से राजर्षि कुत्स के कल्याण के लिए कृष्ण
असुर को नीचे की ओर मुंह करके मारा था तथा अपनी शक्ति से शत्रुओं की गाएं प्राप्त की
थीं. (१७)
त्वं ह त्यद्वृषभ चर्षणीनां घनो वृत्राणां तविषो बभूथ.
त्वं सिन्धूँरसृजस्तस्तभानान् त्वमपो अजयो दासपत्नीः.. (१८)
हे इंद्र! तुमने वह कार्य किया है. हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम मनुष्यों के भावी उपद्रवों
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