ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1294 of 1855
Read in contextहिंसा हिंसक भी न कर सकें. (९)
वृज्याम ते परि द्विषोऽरं ते शक्र दावने. गमेमेदिन्द्र गोमतः.. (१०)
हे इंद्र! हम याचना करने के लिए तुम्हारे शत्रुओं के पास न जावें. हे गायों वाले एवं
पर्याप्त दाता इंद्र! हम तुम्हारे पास जावें. (१०)
शनैश्चिद्यन्तो अद्रिवोऽश्वावन्तः शतग्विनः. विवक्षणा अनेहसः.. (११)
हे वज्रधारी इंद्र! तुम धीरे-धीरे जाते हुए इन घोड़ों वाले, अधिक धनसंपन्न, चतुर एवं
उपद्रवरहित हो. (११)
ऊर्ध्वा हि ते दिवेदिवे सहस्रा सूनृता शता. जरितृभ्यो विमंहते.. (१२)
हे इंद्र! यजमान तुम्हारे स्तोता के लिए प्रतिदिन सैकड़ों एवं हजारों उत्तम सुखसाधन
देता है. (१२)
विद्या हि त्वा धनञ्जयमिन्द्र दृळ्हा चिदारुजम्.
आदारिणं यथा गयम्.. (१३)
हे इंद्र! हम तुम्हें धन जीतने वाला, दृढ़ शत्रुओं को भी भग्न करने वाला, शत्रुओं का धन
छीनने वाला एवं घर के समान रक्षा करने वाला जानते हैं. (१३)
ककुहं चित्त्वा कवे मन्दन्तु धृष्णविन्दवः. आ त्वा पणिं यदीमहे.. (१४)
हे कवि, शत्रुपराभवकारी एवं वणिक्वृत्ति वाले इंद्र! जब हम तुमसे अभीष्ट वस्तु की
याचना करें, उस समय हमारा सोम बैल की ठाट के समान ऊंचा होकर तुम्हें प्रसन्न करे. (१४)
यस्ते रेवाँ अदाशुरिः प्रममर्ष मघत्तये. तस्य नो वेद आ भर.. (१५)
हे इंद्र! जो व्यक्ति धनवान् होकर तुम धनस्वामी के लिए दान नहीं करता अथवा तुम्हारी
निंदा करता है, उसका धन हमारे पास ले आओ. (१५)
इम उ त्वा वि चक्षते सखाय इन्द्र सोमिनः. पुष्टावन्तो यथा पशुम्.. (१६)
हे इंद्र! सोमरस निचोड़ने वाले मेरे वे मित्र तुम्हें उसी प्रकार देखते हैं, जिस प्रकार घास
लाने वाले लोग पशु को देखते हैं. (१६)
उत त्वाबधिरं वयं श्रुत्कर्णं सन्तम्मतये. दूरादिह हवामहे.. (१७)
हे बधिरतारहित एवं सुनने में सक्षम कान वाले इंद्र! यज्ञ में रक्षा के निमित्त तुम्हें हम दूर
से बुलाते हैं. (१७)
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