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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1278 of 1855

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Page 1278

इमा जुषेथां सवना येभिर्हव्यान्यूहथुः. इन्द्राग्नी आ गतं नरा.. (५)
हे यज्ञ के नेता इंद्र व अग्नि! तुम जिन सवनों के द्वारा हव्य वहन करते हो, उन्हीं में
सम्मिलित बनो. तुम यहां आओ. (५)
इमां गायत्रवर्तनिं जुषेथां सुष्टुतिं मम. इन्द्राग्नी आ गतं नरा.. (६)
हे यज्ञ के नेता इंद्र व अग्नि! तुम गायत्री छंद में निर्मित इस स्तुति को स्वीकार करो एवं
यहां आओ. (६)
प्रातर्यावभिरा गतं देवेभिर्जन्यावसू. इन्द्राग्नी सोमपीतये.. (७)
हे शत्रुधन जीतने वाले इंद्र व अग्नि! तुम प्रातःकाल आने वाले देवों के साथ सोमरस
पीने के लिए आओ. (७)
श्यावाश्वस्य सुन्वतोऽत्रीणां शृणुतं हवम्. इन्द्राग्नी सोमपीतये.. (८)
हे इंद्र और अग्नि! तुम सोमरस निचोड़ने वाले यजमान मुझ श्यावाश्व एवं मेरे ऋत्विज्
अत्रि की पुकार सोमरस पीने के लिए सुनो. (८)
एवा वामह्व ऊतये यथाहुवन्त मेधिराः. इन्द्राग्नी सोमपीतये.. (९)
हे इंद्र व अग्नि! तुम्हें पूर्वकाल में विद्वानों ने जिस प्रकार बुलाया था, उसी प्रकार मैं रक्षा
एवं सोमपान के लिए तुम्हें बुलाता हूं. (९)
आहं सरस्वतीवतोरिन्द्राग्न्योरवो वृणे. याभ्यां गायत्रमृच्यते.. (१०)
मैं उन्हीं स्तुतिशाली इंद्र व अग्नि से अपनी रक्षा की प्रार्थना करता हूं, जिनके लिए
गायत्री छंद वाले साममंत्र बोले जाते हैं. (१०)
सूक्त—३९ देवता—अग्नि
अग्निमस्तोष्युग्मियमग्निमीळा यजध्यै.
अग्निर्दैवाँ अनक्तु न उभे हि विदथे कविरन्तश्चरति दूत्यं१ नभन्तामन्यके समे.. (१)
ऋक् मंत्रों के योग्य अग्नि की मैं स्तुति करता हूं. मैं यज्ञ के योग्य अग्नि की स्तुति करता
हूं. अग्नि हमारे यज्ञ में हव्यों द्वारा देवों का यजन करें. विद्वान् अग्नि धरती-आकाश के बीच
दूतकार्य करते हैं. वे सभी शत्रुओं को मारें. (१)
न्यग्ने नव्यसा वचस्तनूषु शंसमेषाम्.
न्यराती रराव्णां विश्वा अर्यो अरातीरितो युच्छन्त्वामुरो नभन्तामन्यके समे.. (२)
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