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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1277 of 1855

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Page 1277

माध्यन्दिनस्य सवनस्य वृत्रहन्ननेद्य पिबा सोमस्य वज्रिवः.. (५)
हे यज्ञस्वामी इंद्र! तुम समस्त रक्षासाधनों के द्वारा सारे संसार एवं योगक्षेम के स्वामी
हो. हे निंदारहित, वज्रधारी एवं वृत्रहंता इंद्र! तुम माध्यंदिन सवन में सोमरस पिओ. (५)
क्षत्राय त्वमवसि न त्वमाविथ शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः.
माध्यन्दिनस्य सवनस्य वृत्रहन्ननेद्य पिबा सोमस्य वज्रिवः.. (६)
हे यज्ञस्वामी इंद्र! तुम समस्त रक्षासाधनों से विश्व को बल देने का कारण बनते हो एवं
आश्रितों की रक्षा करते हो. हे निंदारहित, वज्रधारी एवं वृत्रहंता इंद्र! तुम माध्यंदिन सवन में
सोमरस पिओ. (६)
श्यावाश्वस्य रेभतस्तथा शृणु यथाशृणोरेत्रेः कर्माणि कृण्वतः.
प्र त्रसदस्युमाविथ त्वमेक इन्नृषाह्या इन्द्र क्षत्राणि वर्धयन्.. (७)
हे इंद्र! तुमने जिस प्रकार अत्रि की स्तुतियां सुनी थीं, उसी प्रकार सोमरस निचोड़ने वाले
एवं यज्ञकर्म करने वाले श्यावाश्व ऋषि की स्तुतियों को भी सुनो. हे इंद्र! तुमने अकेले ही
स्तुतियों को बढ़ाते हुए युद्ध में त्रसदस्यु की रक्षा की थी. (७)
सूक्त—३८ देवता—इंद्र व अग्नि
यज्ञस्य हि स्थ ऋत्विजा सस्नी वाजेषु कर्मसु. इन्द्राग्नी तस्य बोधतम्.. (१)
हे इंद्र व अग्नि! तुम शुद्ध एवं यज्ञ के ऋत्विज् हो. तुम युद्धों एवं यज्ञकर्मों में मेरी स्तुति
समझो. (१)
तोशासा रथयावाना वृत्रहणापराजिता. इन्द्राग्नी तस्य बोधतम्.. (२)
हे शत्रुनाशक, रथ द्वारा चलने वाले, वृत्रहंता एवं अपराजित इंद्र व अग्नि! मेरी स्तुतियों
को जानो. (२)
इदं वां मदिरं मध्वधुक्षन्नद्रिभिर्नरः. इन्द्राग्नी तस्य बोधतम्.. (३)
हे इंद्र व अग्नि! यज्ञ के नेताओं ने तुम्हारे लिए पाषाणों की सहायता से मधुर सोमरस
तैयार किया है. तुम मेरी स्तुति समझो. (३)
जुषेथां यज्ञमिष्टये सुतं सोमं सधस्तुती. इन्द्राग्नी आ गतं नरा.. (४)
हे यज्ञ के नेता एवं समानरूप से स्तुत इंद्र व अग्नि! यज्ञ में सम्मिलित होओ एवं यज्ञ के
निमित्त निचोड़े हुए सोमरस की ओर आओ. (४)
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