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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1244 of 1855

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Page 1244

इन्द्र यथा ह्यस्ति तेऽपरीतं नृतो शवः. अमृक्ता रातिः पुरुहूत दाशुषे.. (९)
हे सबको नचाने वाले इंद्र! तुम्हारा बल शत्रुओं द्वारा दबाया नहीं जा सकता. हे बहुतों
द्वारा बुलाए गए इंद्र! हव्यदाता यजमान को तुम्हारे द्वारा दिया हुआ धन शत्रुओं द्वारा नष्ट नहीं
होता. (९)
आ वृषस्व महामह महे नृतम राधसे. दृळहश्चिद् दृह्य मघवन्मघत्तये.. (१०)
हे अतिशय पूजनीय एवं नेताओं में श्रेष्ठ इंद्र! शत्रुओं का महान् धन प्राप्त करने के लिए
सोमरस से अपना उदर भरो. हे धनवान् इंद्र! धनलाभ के लिए तुम शत्रुओं के दृढ़ नगरों को
भी नष्ट करो. (१०)
नू अन्यत्रा चिदद्रिवस्त्वन्नो जग्मुराशसः. मघवञ्छग्धि तव तन्न ऊतिभिः.. (११)
हे वज्रधारी इंद्र! तुमसे पहले हमने अन्य देवों से धनादि पाने की आशाएं की थीं. हे
धनवान् इंद्र! तुम रक्षा के साथ हमारी आशाएं पूरी करो. (११)
नह्य१ङ्ग नृतो त्वदन्यं विन्दामि राधसे. राये द्युम्नाय शवसे च गिर्वणः.. (१२)
हे सबको नचाने वाले एवं स्तुति योग्य इंद्र! मैं बलप्रद अन्न, धन, तेजस्वी यश एवं बल
पाने के लिए तुम्हारे अतिरिक्त किसी को नहीं पाता. (१२)
एन्दुमिन्द्राय सिञ्चत पिबाति सोम्यं मधु. प्र राधसा चोदयते महित्वना.. (१३)
हे ऋत्विजो! तुम इंद्र के लिए सोमरस निचोड़ो. वे ही मधुर सोमरस पीएं. वे अपने
महत्त्व से स्तोताओं को अन्न के साथ धन भी देते हैं. (१३)
उपो हरीणां पतिं दक्षं पृच्छन्तमब्रवम्. नूनं श्रुधि स्तुवतो अश्व्यस्य.. (१४)
मैं हरि नामक अश्वों के स्वामी एवं अपना बल दूसरों को देने वाले इंद्र की स्तुति करता
हूं. मैं व्यश्व ऋषि का पुत्र हूं. मेरी स्तुति सुनो. (१४)
नह्य१ङ्ग पुरा चन जज्ञे वीरतरस्त्वत्. नकी राया नैवथा न भन्दना.. (१५)
हे इंद्र! प्राचीनकाल में तुमसे अधिक वीर, धनसंपन्न, शत्रुओं पर आक्रमण करने वाला
एवं स्तुति योग्य कोई नहीं हुआ. (१५)
एदु मध्वो मदिन्तरं सिञ्च वाध्वर्यो अन्धसः. एवा हि वीरः स्तवते सदावृधः.. (१६)
हे अध्वर्युगण! तुम मदकारक सोमलता के अतिशय मदकारक अंश सोमरस को इंद्र के
लिए निचोड़ो. वीर एवं सदा बढ़ने वाले इंद्र की ही स्तुति की जाती है. (१६)
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