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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1233 of 1855

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Page 1233

भी तुम्हारी मित्रता पाने के लिए तुम्हारे पास आता है. इसलिए तुम हमारे पक्ष के बनकर
बोलो. अत्यंत धारण करने योग्य यज्ञ में तुम्हारा बंधुत्व सदा वर्तमान रहता है. (२२)
मरुतो मारुतस्य न आ भेषजस्य वहता सुदानवः. यूयं सखायः सप्तयः.. (२३)
हे शोभन दान वाले, सखा एवं गतिशील मरुतो! तुम अपनी ओषधि हमारे समीप
लाओ. (२३)
याभिः सिन्धुमवथ याभिस्तूर्वथ याभिर्दशस्यथा क्रिविम्.
मयो नो भूतोतिभिर्मयोभुवः शिवाभिरसच्चद्विषः.. (२४)
हे सुख देने वाले एवं शत्रुशून्य मरुतो! जिन रक्षासाधनों द्वारा तुम समुद्र की रक्षा करते
हो, जिनके द्वारा स्तोताओं के शत्रुओं को नष्ट करते हो, जिनसे तुमने गौतम को कुआं दिया
था, सब प्रकार का कल्याण करने वाले उन्हीं रक्षासाधनों द्वारा हमें सुरक्षा प्रदान करो. (२४)
यत्सिन्धौ यदसिक्न्यां यत्समुद्रेषु मरुतः सुबर्हिषः.
यत्पर्वतेषु भेषजम्.. (२५)
हे शोभन यश वाले मरुतो! सिंधु तथा असिक्नी नदी समुद्रों एवं पहाड़ों में जो ओषधियां
हैं. (२५)
विश्वं पश्यन्तो बिभृथा तनूष्वा तेना नो अधि वोचत.
क्ष्मा रपो मरुत आतुरस्य न इष्कर्ता विह्रुतं पुनः.. (२६)
वे सब ओषधियां पहचानकर हमारे शरीर की चिकित्सा के लिए ले आओ. हे मरुतो!
हम लागों के बाधा वाले अंक को इस प्रकार पुनः ठीक करो, जिससे रोगी का रोग दूर हो
जाए. (२६)
सूक्त—२१ देवता—इंद्र
वयमु त्वामपूर्व स्थूरं न कच्चिद्भरन्तोऽवस्यवः. वाजे चित्रं हवामहे.. (१)
हे अपूर्व इंद्र! हम रक्षा पाने की इच्छा से तुम्हें सोमरस द्वारा पुष्ट करके इस प्रकार बुलाते
हैं, जैसे कोई गुणी मनुष्य को बुलाता है. तुम संग्राम में भांति-भांति के रूप धारण करते हो.
(१)
उप त्वा कर्मन्नूतये स नो युवोग्रश्चक्राम यो धृषत्.
त्वामिद्ध्वयवितारं ववृमहे सखाय इन्द्र सानसिम्.. (२)
हे इंद्र! हम यज्ञकर्म की रक्षा के लिए तुम्हारे पास आते हैं. युवा, उग्र एवं
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