ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयस्य वा यूयं प्रति वाजिनो नर आ हव्या वीतये गथ.
अभि ष द्युम्नैरुत वाजसातिभिः सुम्ना वो धूतयो नशत्.. (१६)
हे नेताओ एवं सबको कंपित करने वाले मरुतो! जिस हव्यधारी यजमान का हव्य भोग
करने के लिए तुम आते हो, वह तुम्हारे दीप्तिशाली अन्नों एवं अन्न के भोगों द्वारा तुम्हारे सुखों
को चारों ओर विस्तृत करता है. (१६)
यथा रुद्रस्य सूनवो दिवो वशन्त्यसुरस्य वेधसः. युवानस्तथेदसत्.. (१७)
रुद्रपुत्र, जल के कर्त्ता एवं सदा युवा मरुद्गण द्युलोक से आकर हमें चाहें, हमारी स्तुति
में इतना प्रभाव हो. (१७)
ये चार्चन्ति मरुतः सुदानवः स्मन्मीळहुषश्चरन्ति ये.
अतश्चिदा न उप वस्यसा हृदा युवान आ ववृध्वम्.. (१८)
जो शोभनदान वाले यजमान मरुतों की पूजा करते हैं एवं जो वर्षाकारक मरुतों की
हव्य द्वारा सेवा करते हैं, हम उन दोनों प्रकार के हैं. हे युवा मरुतो! हमें धन देने का निश्चय
मन में करके हमसे मिलो. (१८)
यून ऊ षु नविष्ठया वृष्णः पावकाँ अभि सोभरे गिरा. गाय गा इव चर्कृषत्.. (१९)
हे सौभरि ऋषि! तुम नित्य तरुण, वर्षाकारक एवं पवित्रकर्त्ता मरुतों की स्तुति अतिशय
नवीन वाक्यों द्वारा उस सुंदर रूप से करो, जिस प्रकार किसान अपने बैलों की प्रशंसा करता
है. (१९)
साहा ये सन्ति मुष्टिहेव हव्यो विश्वावसु पृत्सु होतृषु.
वृष्णश्चन्द्रान्न सुश्रवस्तमान् गिरा वन्दस्व मरुतो अह.. (२०)
मरुद्गण समस्त योद्धाओं द्वारा आह्वान करने पर शत्रुओं को हराते हैं. हे सौभरि! इस
समय बुलाने योग्य मल्ल के समान, वर्षाकारक, सबको प्रसन्न करने वाले एवं परम यशस्वी
मरुतों की स्तुति शोभनवचनों द्वारा करो. (२०)
गावश्चिद्घा समन्यवः सजात्येन मरुतः सबन्धवः. रिहते ककुभो मिथः.. (२१)
हे समान क्रोध वाले मरुतो! तुम्हारी माता गाएं भी समान जाति एवं समान बंधु वाली
होने के कारण दिशाओं के रूप में एक-दूसरों को चाटती हैं. (२१)
मर्तश्चिद्धो नृतवो रुक्मवक्षस उप भ्रातृत्वमायति.
अधि नो गात मरुतः सदा हि व आपित्वमस्ति निध्रुवि.. (२२)
हे नृत्य करने वाले एवं वक्षस्थल पर सोने के आभूषण धारण करने वाले मरुतो! मनुष्य
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