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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1190 of 1855

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Page 1190

(१५)
यस्त इन्द्र महीरपः स्तभूयमान आशयत्. नितं पद्यासु शिश्रथः.. (१६)
हे इंद्र! जो वृत्र तुम्हारे महान् जल को रोक कर अंतरिक्ष में सोया था, उसे तुमने गतिशील जल के मध्य मारा था. (१६)
य इमे रोदसी मही समीची समजग्रभीत्. तमोभिरिन्द्र तं गुहः.. (१७)
हे इंद्र! जिस वृत्र ने विस्तृत एवं परस्पर मिलित द्यावा-पृथिवी को ढक लिया था, उसे तुमने अंधकार में विलीन कर दिया था. (१७)
य इन्द्र यतयस्त्वा भृगवो ये च तुष्टुवुः. ममेदुग्र श्रुधी हवम्.. (१८)
हे उग्र इंद्र! जो संयमी अंगिरागोत्रीय ऋषि एवं भृगुगोत्रीय ऋषि तुम्हारी स्तुति करते हैं, उनके मध्य में मेरी स्तुति सुनो. (१८)
इमास्त इन्द्र पृश्नयो घृतं दुहत आशिरम्. एनामृतस्य पिप्युषीः.. (१९)
हे इंद्र! ये यज्ञ को पूर्ण करने वाली गाएं घी तथा दूध देती हैं. (१९)
या इन्द्र प्रस्वस्तवासा गर्भमचक्रिरन्. परि धर्मेव सूर्यम्.. (२०)
हे इंद्र! इन प्रसव वाली गायों ने मुख से अन्न खाकर इस प्रकार गर्भ धारण किया है, जिस प्रकार सूर्य के चारों ओर जल रहता है. (२०)
त्वामिच्छवसस्पते कण्वा उक्थेन वावृधुः. त्वां सुतास इन्दवः.. (२१)
हे शक्ति के स्वामी इंद्र! कण्वगोत्रीय ऋषियों ने तुम्हें उक्थ द्वारा बढ़ाया. निचोड़े हुए सोम ने तुम्हें बढ़ाया. (२१)
तवेदिन्द्र प्रणीतिषूत प्रशस्तिरद्रिवः. यज्ञो वितन्तसाय्यः.. (२२)
हे वज्रधारी इंद्र! जब तुम मार्गदर्शक बनते हो, तब उत्तम स्तुति एवं विशाल यज्ञ किया जाता है. (२२)
आ न इन्द्र महीमिषं पुरं न दर्षि गोमतीम्. उत प्रजां सुवीर्यम्.. (२३)
हे इंद्र हमारे लिए महान्, गायों सहित अन्न एवं शोभनवीर्य वाला पुत्र देने की इच्छा करो. (२३)
उत त्यदाश्वश्व्यं यदिन्द्र नाहुषीष्वा. अग्रे विक्षु प्रदीदयत्.. (२४)