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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1019 of 1855

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Page 1019

आती है. पति का आलिंगन करके बात करने वाली नारी के समान यह डोरी बाण को छूकर
शब्द करती है. (३)
ते आचरन्ती समनेव योषा मातेव पुत्रं बिभृतामुपस्थे.
अप शत्रून् विध्यतां संविदाने आर्ती इमे विष्फुँरन्ती अमित्रान्.. (४)
धनुष की दोनों कोटियां परस्पर प्रिय आचरण करने वाली नारियों के समान कार्य करती
हुई युद्ध में राजा की इस प्रकार रक्षा करें, जिस प्रकार माता पुत्र की रक्षा करती है. ये परस्पर
विरोध छोड़कर जाती हुई इस राजा के अमित्रों को मारकर शत्रुओं को बेध दें. (४)
बह्वीनां पिता बहुरस्य पुत्रश्चिश्चा कृणोति समनावगत्य.
इषुधिः सङ्काः पृतनाश्च सर्वाः पृष्ठे निनद्धो जयति प्रसूतः.. (५)
यह तरकस बहुत से बाणों का पिता है. बहुत से बाण इसके पुत्र हैं. बाण निकालने पर
इससे त्रिश्चा शब्द होता है. तरकस योद्धा की पीठ पर बंधा हुआ है, युद्धों को जानकर बाणों
को जन्म देता है एवं सब सेनाओं को जीतता है. (५)
रथे तिष्ठन्नयति वाजिनः पुरो यत्रयत्र कामयते सुसारथिः.
अभीशूनां महिमानं पनायत मनः पश्चादनु यच्छन्ति रश्मयः.. (६)
उत्तम सारथि रथ पर बैठकर अपने सामने वाले घोड़ों को जहां चाहता है, वहां ले जाता
है. हे मनुष्यो! उन लगामों की महिमा बखानो. घोड़े के मुंह से पीछे की ओर जाती हुई लगामें
सारथि के मन के अनुसार घोड़ों को वश में करती हैं. (६)
तीव्रान् घोषान् कृण्वते वृषपाणयोऽश्वा रथेभिः सह वाजयन्तः.
अवक्रामन्तः प्रपदैरमित्रान् क्षिणन्ति शत्रूँरनपव्ययन्तः.. (७)
धूल उड़ाते हुए एवं रथों के साथ तेज दौड़ते हुए घोड़े जोर से हिनहिनाते हैं. वे युद्ध से न
भागते हुए हिंसक शत्रुओं को अपनी टापों से कुचलते हैं. (७)
रथवाहनं हविरस्य नाम यत्रायुधं निहितमस्य वर्म.
तत्रा रथमुप शग्मं सदेम विश्वाहा वयं सुमनस्यमानाः.. (८)
हवि जिस प्रकार अग्नि को बढ़ाता है, उसी प्रकार रथ द्वारा ढोया गया शत्रुओं का धन
इस राजा को बढ़ाता है. रथ पर राजा के आयुध और कवच रखे रहते हैं. प्रसन्नचित्त हम
भरद्वाजवंशी सदा उस रथ के पास जावें. (८)
स्वादुषद्सदः पितरो वयोधाः कृच्छ्रेश्रितः शक्तिवन्तो गभीराः.
चित्रसेना इषुबला अमृध्राः सतोवीरा उरवो व्रातसाहाः.. (९)
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