ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1006 of 1855
Read in contextसूक्त—६५ देवता—उषा
एषा स्या नो दुहिता दिवोजाः क्षितीरुच्छन्ती मानुषीरजीगः.
या भानुना रुशता राम्यास्वज्ञाायि तिरस्तमसश्चिद्दक्तून्.. (१)
स्वर्ग से उत्पन्न, अतएव स्वर्ग की पुत्री उषा हमारे कल्याण के लिए अंधकार मिटाती हुई
मानवी प्रजाओं को प्रकाशित करती है. यह चमकीली किरणों के द्वारा रात्रि के अंत में
तेजस्वी तारों एवं अंधकार को तिरस्कृत करती हुई दिखाई देती है. (१)
वि तद्ययुररुणयुग्भिरश्वैश्चित्रं भान्त्युषसश्चन्द्ररथाः.
अग्रं यज्ञस्य बृहतो नयन्तीर्वि ता बाधन्ते तम ऊर्म्यायाः.. (२)
चमकीले रथ वाली उषाएं प्रातःकाल विशालयज्ञ का प्रथम भाग पूरा करती हुई, लाल
रंग वाले घोड़ों की सहायता से विस्तृत गमन करती हैं, विचित्र रूप से शोभा पाती हैं तथा रात
के अंधेरे को समाप्त करती हैं. (२)
श्रवो वाजमिषमूर्जं वहन्तीर्नि दाशुष उषसो मर्त्याय.
मघोनीर्वीरवत्पत्यमाना अवो धात विधते रत्नमद्य.. (३)
हे उषाओ! तुम हव्य देने वाले मनुष्य को कीर्ति, बल, अन्न और रस धारण कराती हुई
धन स्वामिनी एवं गतिशील बनती हो. आज मुझ सेवक को पुत्र-पौत्र युक्त अन्न एवं रत्न दो.
(३)
इदा हि वो विधते रत्नमस्तीदा वीराय दाशुष उषासः.
इदा विप्राय जरते यदुक्था नि ष्म मावते वहथा पुरा चित्.. (४)
हे उषाओ! तुम्हारे पास अपने सेवक को इसी समय देने के लिए धन है एवं वीर
हव्यदाताओं को इसी समय देने के लिए धन है. बुद्धिमान् स्तोता को इसी समय देने के लिए
तुम्हारे पास धन है. मुझ जैसे उक्थ मंत्र जानने वाले के लिए तुम पहले के समान धन दो. (४)
इदा हि त उषो अद्रिसानो गोत्रा गवामङ्गिरसो गृणन्ति.
व्य१र्केण बिभिदुर्ब्रह्मणा च सत्या नृणामभवद्देवहूतिः.. (५)
हे पर्वत की चोटियों का आदर करने वाली उषा! अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने तुम्हारी कृपा
से गायों का समूह तुरंत प्राप्त किया एवं आदरणीय स्तोत्र द्वारा अंधकारों का विनाश किया.
नेतारूप अंगिरागोत्रीय ऋषियों की देवविषयक स्तुति सत्य हुई थी. (५)
उच्छा दिवो दुहितः प्रत्नवन्नो भरद्वाजवद्विधते मघोनि.
सुवीरं रयिं गृणते रिरीह्युरुगायमध्धि धेहि श्रवो नः.. (६)
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