ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1005 of 1855
Read in contextउदु श्रिय उषसो रोचमाना अस्थुरपां नोर्मयो रुशन्तः.
कृणोति विश्वा सुपथा सुगान्यभूदु वस्वी दक्षिणा मघोनी.. (१)
चमकती हुई व शुक्लवर्ण वाली उषाएं शोभा के लिए पानी की लहरों के समान उठती
हैं. धन की स्वामिनी, प्रशंसा योग्य एवं समृद्ध करने वाली उषा सभी स्थानों को सुंदरमार्ग
वाला एवं सुगम बनाती है. (१)
भद्रा ददृक्ष उर्विया वि भास्युत्ते शोचिर्भानवो द्यामपप्तन्.
आविर्वक्षः कृणुषे शुम्भमानोषो देवि रोचमाना महोभिः.. (२)
हे देवी उषा! तुम कल्याणी जान पड़ती हो एवं विस्तीर्ण होकर शोभा पा रही हो.
तुम्हारी चमकीली किरणें आकाश से गिर रही हैं. तुम महान् तेजों से सुशोभित एवं दीप्त
होकर अपना रूप प्रकट करती हो. (२)
वहन्ति सीमरुणासो रुशन्तो गावः सुभगामुर्विया प्रथानाम्.
अपेजते शूरो अस्तेव शत्रून् बाधते तमो अजिरो न वोळ्हा.. (३)
लाल रंग की एवं चमकीली किरणें सुभगा, विस्तृत एवं उत्तम उषा को वहन करती हैं.
जिस प्रकार अस्त्र फेंकने वाला शूर शत्रुओं को दूर भगाता है, उसी प्रकार उषा अंधकार को
भगाती है तथा शीघ्रगामी सेनापति के समान अंधेरे को रोकती है. (३)
सुगोत ते सुपथा पर्वतेष्ववाते अपस्तरसि स्वभानो.
सा न आ वह पृथुयामन्पृष्वे रयिं दिवो दुहितरिषयध्यै.. (४)
हे उषा देवी! पहाड़ एवं बिना हवा वाले स्थान तुम्हारे लिए सुगम एवं सरल मार्ग वाले
हों. हे स्वयंप्रकाश वाली उषा! तुम अंतरिक्ष को पार करती हो. विशाल रथवाली, दर्शनीय एवं
स्वर्ग की पुत्री उषा हमें अभिलाषा करने योग्य धन दें. (४)
सा वह योक्षभिरवातोपो वरं वहसि जोषमनु.
त्वं दिवो दुहितर्या ह देवी पूर्वहूतौ मंहना दर्शता भूः.. (५)
हे उषा! तुम बिना विराम लिए घोड़ों की सहायता से स्तोताओं के लिए प्रेमपूर्वक धन
ढोती हो. हे स्वर्गपुत्री उषा देवी! तुम प्रथम आह्वान में पूजा के योग्य एवं दर्शनीय बनो. (५)
उत्ते वयश्चिद्वसतेरपप्तन्नरश्च ये पितुभाजो व्युष्टौ.
अमा सते वहसि भूरि वाममुषो देवि दाशुषे मर्त्याय.. (६)
हे उषा देवी! तुम्हारे प्रकट होने पर चिड़ियां अपने घोंसलों से उड़ती हैं एवं अन्न पैदा
करने वाले मनुष्य अपने घरों से निकलते हैं. तुम अपने समीपवर्ती एवं हव्यदाता मनुष्य को
बहुत धन देती हो. (६)
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