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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

by रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र

DevanagariBrajpublished368 pages

१. सुजान रसखान: कृष्ण रूप-माधुरी व मुरली सवैया

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समीक्षा भाग १७
भयंकर रूप से फैल गया, जिसकी लपेट में सूरवंश के पठानों का सर्वनाश हो
गया था । इस लगातार दो वर्षों के युद्ध के कारण दिल्ली नगर श्मशानवत् हो
गया था । कहने का तात्पर्य यह है कि रसखान ने संवत् १६१२ की घटना से
त्रस्त होकर अपने प्राण रक्षणार्थ या संसार से एकदम विरक्त होकर दिल्ली
छोड़ ब्रजवास किया । इस तथ्य में सन्देह का कोई कारण नहीं है ।'
इस आधार पर कहा जा सकता है कि रसखान का जन्म संवत् १५६०
ई० के आसपास हुआ होगा, क्योकि दिल्ली छोड़ते समय इनकी अवस्था बीस-
बाईस वर्ष की होगी ।
रसखान ब्रज में कब आये ? यहां पर यह प्रश्न भी विचारणीय है । डॉ०
याज्ञिक के अनुसार वे संवत् १६१२ मे दिल्ली छोड़कर तुरत ब्रज में आ गये थे,
परन्तु तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए यह मत शुद्ध प्रतीत
नहीं होता । 'मूल गुसाईं चरित' के अनुसार रसखान ने संवत् १६३४ से
१६३७ तक अर्थात् तीन वर्ष तक यमुना तट पर राम-कथा का श्रवण किया ।
इसका अभिप्राय यह है कि इस समय तक इनमें कृष्णभक्ति का प्रभाव प्रस्फु-
टित नहीं हुआ था । रसखान के दीक्षा-गुरु श्री विट्ठलनाथ जी का गोलोकवास-
काल संवत् १६४२ है । इसका अर्थ यह हुआ कि संवत् १६३७ से १६४२ के
अन्तराल मे ही रसखान कृष्णभक्ति में दीक्षित हुए और तभी ये ब्रज में जाकर
बसे ।
जिस मानवती के मान की उपेक्षा करके रसखान ब्रज मे आकर बसे, यह
मानिनी कौन है ? इस प्रश्न के उत्तर मे रसखान से सम्बद्ध सभी साधन मौन
हैं । कुछ विद्वानों का अनुमान है कि यह मानवती रसखान की कोई
प्रेमिका होगी । केवल अनुमान का आधार लेकर इस विषय मे इससे अधिक
कुछ नही कहा जा सकता ।
रसखान का जन्म-समय निर्धारित कर लेने के उपरांत अब यह कहना
कठिन नहीं कि जब इन्होंने 'प्रेमवाटिका' की रचना की, तब इनकी आयु ८१
वर्ष की थी, अर्थात् ये काफी लम्बी आयु तक जीवित रहे । अतः अनेक
विद्वानों की यह मान्यता भी असंगत प्रतीत नहीं होती कि ये लगभग ८५ वर्ष
तक जीवित रहे । इस आधार पर इनका देहावसान संवत् १६७५ के लगभग
माना जा सकता है ।

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१८ रसखान-ग्रन्थावली

बाह्य साक्ष्य
रसखान से सम्बंधित बाह्य साक्ष्य के आधार पर तीन कृतियां विशेष रूप
से उल्लेख्य हैं—दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता, मूल गुसाईं चरित और
भक्तमाल ।
१. दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता—इस कृति मे वैष्णव-सम्प्रदाय के
२५२ प्रमुख कवियो का परिचय है । यद्यपि यह परिचय पूर्ण तथा इतिहास-
सगत नही है, फिर भी उसे एकदम निराधार अथवा काल्पनिक नही कहा जा
सकता । इसमे ऐसे अनेक तथ्य मिलते हैं जिससे सम्वद्ध कवि के विषय मे बहुत-
कुछ ज्ञातव्य बातो का बोध हो जाता है। इस कृति की २१८ वी वार्ता रस-
खान से सम्बंधित है, जो इस प्रकार है--
'अब श्री गुसाई जी के सेवक रसखान पठान दिल्ली मे रहते तिनकी
वार्ता । सो दिल्ली मे एक साहूकार रहतो हतो । सो वा साहूकार को बेटा
बहुत सुन्दर हतो । वा छोरा सो रसखान को मन बहुत लग गयो । वाही के
पाछे फिर्यो करै और वाको झूँठो खाय और आठ पहर वाही की नौकरी
करै । पगार कछू लैवे नही, दिन रात वाही मे आसक्त रहै । दूसरे बडी जात
के रसखान की निन्दा बहुत-बहुत करते हते । पर रसखान काहू की सुनते
नही हते और आठ पहर वा साहूकार के बेटा मे चित्त लग्यो रहतो । एक
दिना चार वैस्नव मिलकै भगवत-वार्ता करते हते । करते-करते ऐसी बात
निकसी जो प्रभु मे ऐसो चित्त लगावनो जैसो रसखान को चित्त साहूकार के
बेटा मे लग्यौ है । इतने मे रसखान वा रस्ता निकस्ये, बिनने यह बात सुनी ।
तब रसखान ने कही जो तुम मेरी कहा बात करो हौ । तब वैस्नव ने जो बात
हती सो कही । तब रसखान बोले, प्रभु को सरूप दीखै तो चित्त लगाइये ।
तब वा वैस्नव न श्रीनाथ जी को चित्र दिखायो । सो देखत ही रसखान ने वो
चित्र ले लियो, और मन मे ऐसो संकल्प कर्यो जो ऐसो सरूप देखनो जब
अन्न खाना और उहाँ सूँ घोडा पै बैठकै एक रात मे वृन्दावन आयो और
सबरे दिन सब मदिरन मे भेष बदल कै फिर्यो और सब मदिरन मे दरसन
किये पर वैसे दरसन नही भये । तब गुपालपुर मे गयो और भेस बदलकै श्री-
नाथ जी के दरसन करने कूँ गयो । तब सिंघमौरिया ने भगवदिच्छा सूँ वाके
चिन्ह बड़ी जातवारे के पहिचाने । तब वाकू धक्का मार निकास दियो,

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समीक्षा भाग १६
भीतर पैठन न दियो। सो जइके गोविंदकुंड पर रह्यो। तीन दिन ताईं पर्यो
रह्यो। खायवे पीवे की कछू अपेक्षा राखी नाही। तब श्रीनाथ जी ने जानी
यह जीव दैवी है और शुद्ध है, और सात्विक है और मेरो भक्त है, या कूँ
दरसन देऊँ तो ठीक है। तब श्रीनाथ जी ने दरसन दिए। तब वो उठिकै श्री-
नाथ जी कूँ पकरिवे दौर्यो। सो श्रीनाथ जी भाज गये। फेर श्रीनाथ जी ने
गुसाईं जी सूं कही, ये जीव दैवी है और म्लेच्छ योनि कूँ पायो है, जासूँ
याके ऊपर कृपा करो, या कूँ सरन लेग्रो। जहाँ ताईं तुम्हारो सम्बंध जीव कूँ
नाही हावै तहाँ ताईं मै जीव कूँ स्पर्श नाही करत हूँ और वाके हाथ को
खाऊँ नाही, जासूँ अब याको अंगीकार करो। तब श्री गुसाईं जी श्रीनाथ
जी के वचन सुनिकै गोविंद कुंड पै पधारे और वाकूँ नाम सुनायो और
साक्षात् श्रीनाथ जी के दरसन श्री गुसाईं जी के सरुप मे वाकूँ भए। तब श्री
गुसाई जी विनकूँ संग लै पधारे और उत्थापन के दरसन कराए। महाप्रसाद
लिवायो। तब रसखान जी श्रीनाथ जी के सरुप मे आसक्त भए। तब रसखान
ने अनेक कीर्तन और कविता और दोहा बहुत प्रकार के बनाये। जैसे-जैसे
लीला के दरसन विनकूँ भए, वैसे ही बरनन किये। सो वे रसखान श्री गुसाईं
जी के ऐसे कृपापात्र हते जिनकूँ चित्र के दरसन करत मात्र ही संसार सूँ चित्त
खिंच के श्रीनाथ जी मे लग्यौ। इनके भाग्य की कहा बडाई करनी। वार्ता
सम्पूर्ण।'
२. मूल गुसाईं चरित — इस कृति के लेखक बाबा वेणीमाधवदास है।
इसमे बताया गया है कि जब 'रामचरितमानस' की रचना पूर्ण हो गई तो
सबमे पहले उसे मिथिला के रूपारण्य स्वामी ने अयोध्या मे सुना। तत्पश्चात्
स्वामी नंदलाल के शिष्य दयालदास (अथवा दलालदास) ने 'मानस' की प्रतिलिपि
करके उसे यमुना-तट पर अपने गुरु नंदलाल और रसखान को सुनाया—
'मिथिला के सुसंत सुजान हते। मिथिलाधिप भाव पगेर हते॥
सुचि काम रूपारुन स्वामी जुतो। तिहिं औसर ओध मे आयो हुतो॥
प्रथम यह मानस तेई सुने। तिनही अधिकारि गुसाईं गुने॥
स्वामी नंद (सु) लाल को सिष्य पुनी। तिसु नाम दलाल सुदास गुनी॥
लिखि के सोइ पोथी स्वठाम गयो। गुरु के ढिग जाइ सुनाम दयो॥
जमुना-तट पै त्रय वत्सर लौ। रसखानहिं जाइ सुनावत भौ॥

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२० रसखान-ग्रन्थावली
इस उद्धरण से यह ज्ञात होता है कि रसखान ने तीन वर्ष तक, अर्थात् संवत्
१६३४ से १६३७ तक, यमुना किनारे 'रामचरितमानस' की कथा का श्रवण
किया था। चाहे 'मूल गुसाईं चरित' प्रामाणिक हो, अथवा अप्रामाणिक, पर
यह कहना अनुपयुक्त नहीं कि इससे रसखान की धर्म के प्रति उदारता का पता
चलता है। यद्यपि ये मूलतः कृष्ण-भक्त है, पर अन्य धार्मिक सम्प्रदायो के प्रति,
तुलसी की भाँति, इनकी पूज्य दृष्टि है। तभी तो ये जिस श्रद्धा से कृष्ण की
स्तुति करते हैं, उसी श्रद्धा से शिव और गंगा की महिमा का भी गुणगान
करते हैं।
३. भक्तमाल—वार्त्ता-साहित्य मे भक्तमाल का जितना संवर्द्धन हुआ है
इतना और किसी कृति का नही हुआ। यही कारण है कि समय-समय पर अनेक
कवियो ने भक्तमाल की रचना की है, जैसे-भक्तमाल प्रसग, भक्तमाल प्रदीपन,
भक्तमाल उत्तरार्द्ध, नवभक्तमाल आदि। भक्तमाल के सर्वप्रथम लेखक नाभादास
माने जाते है। नाभादासकृत 'भक्तमाल' मे संवत् १६४३ तक के कृष्ण-भक्तो का
ही उल्लेख है, पर रसखान के विषय मे कुछ नही कहा गया है। इसका कारण
यह हो सकता है कि जब तक रसखान राजनीतिक कारणो से गुप्त जीवन यापन
कर रहे होगे और इसीलिए कृष्ण-भक्तो मे इन्हे इतनी ख्याति प्राप्त न हुई
होगी कि ये 'भक्तमाल' मे स्थान पा सके। 'भक्तमाल' पर अनेक टीकाएँ भी
लिखी गई है। वस्तुत ये टीकाएँ न होकर ग्रन्थ का संवर्द्धन ही कही जा सकती
हैं, क्योकि जैसे-जैसे कृष्ण-भक्तो की सख्या बढती गई, वैसे ही टीका के नाम
पर इस कृति मे कृष्ण-भक्तो का समावेश होता गया। सवत् १७४४ मे प्रियादास
जी के पौत्र वैष्णवदास ने 'भक्तमाल-प्रसग' नामक टीका के द्वारा इस कृति का
संवर्द्धन किया और तब उन्होने रसखान को भी कृष्ण-भक्तो मे सम्मिलित कर
लिया। 'भक्तमाल-प्रसंग' मे रसखान-विषयक प्रमाण इस प्रकार है—
'पातस्याह् न देखी तुरक कंठी पैरन लगे। तब रसखान बुलाए। देखे
तो सो कंठी नार मे परी है। तब पूंछी रसखान, कंठी क्यो राखे है ? तब ये
बोले—हजरत ! काठ की नाव पै पत्थर तिरै याते मै राखी है। ये काठ है, मै
पत्थर हों। तब कही—भले राखो, परन्तु इतेक तो हिन्दू हू नाही राखे। तद
रसखान बोल्यो—वे हलके है। मै भारी पत्थर हों।'

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समीक्षा भाग २१
यद्यपि इस कंथा का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नही मिलता, परन्तु यह जरूर
मिलता है कि मुगल राजाओ ने कंठी-माला धारण पर रोक लगाई हुई थी।
यह रोक गोस्वामी गोकुलनाथ जी के प्रयास से जहाँगीर ने समाप्त की। इस
विषय पर तत्कालीन अनेक कवियो की उक्तियाँ मिलती है।
१. 'जयति विट्ठल सुवन, प्रगट वल्लभ बली,
प्रबल पन करि तिलक माल राखी।'
—हरिराम जी
२ 'माला तिलक न तजी कबहू, परी जदपि पुकार।'
—कल्याणदास
३. 'बिट्ठलेस के सपूत गोकुलेस के हुलास,
माल राखि सौ कलेस काहु मे न राख्यो है।'
—प्रसिद्धि कवि
प्रसिद्धि कवि ने तो इस विषय पर एक प्रबंधकाव्य की ही रचना कर
डाली थी।
इन उक्तियो से यह निष्कर्ष निकालना कठिन नही कि तत्कालीन मुगल उस
मुगल को हीन दृष्टि से देखते थे जो हिन्दुओ की भाँति माला-तिलक धारण
करता था। यह भी संभव है, हिन्दू भी सार्वजनिक स्थानो पर तिलक और
माला धारण करके न जा सकते हैं। इसीलिए तो गोस्वामी गोकुलनाथ जी
को उक्त आज्ञा को हटवाने के लिए काफी प्रयत्न करना पडा। इस पृष्ठभूमि
मे यह अनुमान लगाना भी असंगत नही है कि कंठी धारण करने के कारण
रसखान को भी अनेक यातनाओं का सामना करना पडा होगा। वे यातनायें
चाहे राजा की ओर से हो, या कट्टर पथी मुसलमानो की ओर से।
'भक्तमाल-प्रदीपन' मे रसखान से सम्बद्ध जहां अनेक अन्य कथाओ का
उल्लेख है, वहाँ यह कंठी वाली वार्ता भी पाई जाती है। 'भक्तमाल प्रदीपन'
की कथा इस प्रकार है—
'रसखान जी परम भक्त भगवत के हुए। पहिले मुसलमान थे। बगरज
तवाफ़ (परिक्रमा की इच्छासे) भावः (मक्का-स्थित एक मंदिर जिसे मुसल-
मान ईश्वर का घर मानते हैं।) जो बिंद्रावन मे पहुँचे तो पहले जन्मो के

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२२ रसखान-ग्रन्थावली
= सवावो (पुण्यकर्मों का फल ) ने ज़हूर (प्रत्यक्षीकरण) किया। यानी (अर्थात्)
ब्रिज चंद महाराज ने उस सुरूप सोभायमान ब्रिज सुंदर से कि मोर मुकुट सर
पर, बनमाला पहने हुए, जेवरात (आभूषण) हरेक उजू (प्रत्येक अंग) मे
विराजमान, फूल जा बजा (जहाँ तहाँ) गुँथे हुए, लिवास (पहिचान) ज़र्क वर्क
(तडक भडक वाला) का शोभित, एक हाथ मे मुरली और दूसरे हाथ में
घडी, गो चराते है, दरसन हुए। बमूजिब (अनुसार) देखने इस रूप माधुरी
और दिलरुबा (चितचोर, प्रेमपात्र) के कुछ हालत (दशा) और ही हो गई ।
इस रूप मे महव (तल्लीन) होकर बेहोश (मूर्च्छित) जमीन पर गिर पडे ।
मुरशिद (धर्मगुरु, पीर) हमराह (रहपंथी) था। गश (मूर्च्छा) समझकर दरपए
इलाज (चिकित्सा का इच्छुक) हुआ और पुकारा कि आँखे खोलो। रसखान
जी ने कहा कि उनको उसी वक्त (समय) सब उलूम (विद्याएँ) व मतालिब
(अर्थ समूह, व्याख्याए) जाहिर (व्यक्त) व बातिन (अन्तर्गत, अंतरंग) व
शायरी से वह (काव्यकला-सम्पन्न) हो गया था। कवित्त मे उस मनोहर
मूर्ति का, जो देखी थी, मान (वर्णन) करके आखिर (अं त मे) कहा कि आँखे
क्या खोलू, वह मूर्ति दिल मे बस गई है। मुरशिद (पीर) ने फिर कहा कि
कावे (मक्का-स्थित एक मंदिर) को चलो। रसखान जी ने जवाब दिया कि
कैसा काब और कैसा किब्ल (मक्का का वह स्थान जहाँ काला पत्थर स्था-
पित है और जिसकी ओर मुँह कर नमाज पढ़ी जाती है) जो है सो सब जहाँ
मौजूद (उपलब्ध) है। अब मैं कहाँ जाता हूँ ? ब्रिज का हो चुका। और एक
कवित्त मे बयान (वर्णन) किया कि अगर, आदमी जिस्म (शरीर) मुझको
मिलेगा तो ब्रिज के ग्वाले और लोगो मे रहूँगा और अगर चरिन्द (पशु) हुआ
तो नद बाबा को गौ बछडो मे और अगर सग (पत्थर) हुआ तो गिरिज (गिरि-
राज गोवर्धन) का और अगर परंद हुआ तो ब्रिज के दरखतो (वृक्षो) का।
मुरशिद (पीर) को इन कलामात (वचनो) से ताजुव्व (आश्चर्य) हुआ और
चाहा कि रथ पर डालकर जबरदस्ती (बल पूर्वक) ले जाऊँ। रसखान जी भाग-
कर वन मे जा छिपे और बिरन्दावन मे वास करके हजारहः (सहस्रो) कवित्त
विरन्दावन के, व सुभाव (स्वभाव, गुण) व शोभा प्रिया-प्रियतम के तसनीफ
(पुस्तक लिखकर) भेट किए। और लिवास बैस्नवी धारन किया। माला

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समीक्षा भाग २३
कसीर (अधिक, प्रचुर) पहिना करते थे । किसी ने पूछा कि दो माला ही
काफी (पर्याप्त) है, इस कदर (अत्यधिक) कसरत (बाहुल्य, प्रचुरता) की
क्या जरूरत (आवश्यकता) है ? जवाब दिया कि माला असखास मिस्ले संग
को (पत्थर जैसे व्यक्तियो को) ससार समंदर (सागर) से पार उतार देती
है । सो जो शख्स (व्यक्ति) मिस्ल (समन) छोटे पत्थर के है, उसको तो एक-
दो माला काफी (पर्याप्त) है, और मै मिस्ल संग कला (बडे पत्थर के समान)
हूं, मुझको बहुत माला रखना वाजिब (उचित) है ।
इस कथा मे कोई ऐतिहासिक तथ्य नही, केवल रसखान से सम्बद्ध अनु-
श्रुतियो को दोहरा दिया गया है और वह भी श्रद्धा के साथ ।
भारतेन्दु जी ने अपने भक्तमाल उत्तरार्द्ध मे रसखान के साथ अन्य मुसल-
मान हिन्दी कवियो की ओर दृष्टिपात किया है और उनकी हिन्दी-सेवा से
भाव-विभोर होकर कह उठे है—
'इन मुसलमान हरिजनन पै, कोटिनि हिन्दू वारिए ।'
राधाचरण गोस्वामी ने अपने 'नवभक्तमाल' मे रसखान से सम्बन्धित एक
छप्पय लिखा है, जो इस प्रकार है—
'दिल्ली नगर निवास, बादसा बंश विभाकर ।
चित्र देखि मन हरो, भरो मन प्रेम-सुधाकर ।
श्री गोबरधन आइ, जबै, दरसन नहि पाए ।
टेढे मेढे बचन रचन निरभय ह्वै गाए ।
तब आप आइ सु मनाइ, करि सुस्रूषा मेहमान की ।
कवि कौन मिताई कहि सकै, श्रीनाथ साथ रसखान की ॥'
गोस्वामी जी का यह विवरण नाभादासकृत 'भक्तमाल' पर ही आधारित
है ।
उपर्युक्त वार्ता-साहित्य से रसखान के किसी ऐतिहासिक विवरण पर
ऐतिहासिक दृष्टि से प्रकाश नही पडता, वरन् इनमे लेखको की कृष्णभक्त-कवि
रसखान के प्रति श्रद्धाजलियाँ भी उपलब्ध होती हैं । इसका तात्पर्य यह
नही है कि इनमे वर्णित तथ्य अथवा घटनाएँ निरी काल्पनिक है । इनसे रस-
खान के विषय मे जो निष्कर्ष निकलता है, वह यही है कि इनका प्रारंभिक

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२४ रसखान-ग्रन्थावली
प्रेम ठोस भौतिक था, किन्तु बाद मे वह ईश्वर-प्रेम मे परिणत हो गया और
कृष्ण-भक्त कवियो मे रसखान का विशिष्ट स्थान है।
जन्म-स्थान
रसखान के जन्म-स्थान के विषय मे भी दो मत मिलते है। 'शिवसिंह-
सरोज' मे इन्हे जिला हरदोई के पिहानी जन्म-स्थान का बताया गया है और
इन्होने 'प्रेम-वाटिका' मे अपना जन्म-स्थान दिल्ली बताया है—
'देखि गदर हित साहिबी, दिल्ली-नगर मसान।
छिनहि बादसा वस की, ठसक छेदि रसखान ॥'
अब यह देखना है कि इनमे कौन सा मत सगत है।
डॉ० याज्ञिक शिवसिंह-सरोजकार के मत को असगत मानते हुए लिखते है
कि पिहानी की वस्ती को हुमायूॅ-अकबर ने संवत् १६१२ के बाद बसाया था।
इस कारण रसखान के जन्म के समय पिहानी का कोई अस्तित्व ही नही था।
हां, रसखान का शिष्य कादिरबख्श वहाँ रहा हो, इसकी सभावना हो सकती
है और यह भी सभावना हो सकती है कि भूल से शिष्य के निवास-स्थान को
ही गुरु का जन्म-स्थान समझ लिया हो।
जहाँ तक दिल्ली का सम्बध है, रसखान ने दिल्ली को अपना निवास-
स्थान अवश्य बताया है, पर उसे जन्म-स्थान नही बताया। अत निर्विवाद
रूप से यह भी तो नही कहा जा सकता कि दिल्ली ही इनका जन्म-स्थान है,
किन्तु रसखान के जीवन पर दृष्टिपात करने से यह ज्ञात होता है कि इनका
भक्त-पूर्व जीवन दिल्ली मे ही बीता। इसलिए यह संभावना की जा सकती है
कि इनका जन्म भी दिल्ली मे ही हुआ होगा।
निष्कर्ष
अब तक के विवेचन का निष्कर्ष यह है कि रसखान का जन्म संवत् १५६०
के लगभग दिल्ली मे हुआ। इनका सम्बन्ध तत्कालीन शाही वंश मे था, किन्तु
जब शाही वश का पतन हुआ और दिल्ली उजड गई तो ये संवत् १६१२ के
लगभग दिल्ली को छोडकर ब्रज मे आ गये और वहाँ कृष्ण-भक्ति मे तल्लीन
रहने लगे।
कहते है, कि प्रारंभ मे इनका प्रेम ठोस भौतिक था, अर्थात् ये एक साहू-
कार के लडके पर आसक्त थे, पर सयोग मे इनके मन को ठेस लगी और इनका

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प्रस्तुत चित्र पूर्णतः रिक्त (खाली/white) है, इसमें कोई पाठ (text) उपस्थित नहीं है।

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: ३ :
रसखान की रचनाएँ
रसखान, अन्य कृष्णभक्त-कवियो की भाँति,मूलत भक्त थे। कविता इनका
कर्म नही, वरन् भावाभिव्यक्ति का एक साधन मात्र था। इन्हें जब भी भावावेश
हुआ, वह सवैया या कवित्त के माध्यम से फूट पड़ा। इनके छंदों की संख्या
कितनी है ? इस प्रश्न का निर्विवाद उत्तर देना असम्भव है। तुलसीदास जी के
'भक्तमाल प्रदीपन' के अनुसार इन्होने सहस्त्रो कवित्तो की रचना की ।¹ पर अब
रसखान के नाम से प्राप्त होने वाले असदिग्ध और संदिग्ध छंदो को मिलाकर
कुल ३३४ छंद प्राप्त हुए है। प्रस्तुत सकलन मे इन छंदो को पाँच भागो मे
विभाजित किया गया है—
१. सुजान-रसखान २५५ छंद
२. प्रेम-वाटिका ५३ छंद
३. दान-लीला ११ छंद
४. स्फुट-छंद ५ छंद
५. संदिग्ध-छंद १० छंद
इन भागो का क्रमश. परिचय निम्नलिखित है।
सुजान-रसखान
सुजान-रसखान मे संकलित छंदो का विषय कृष्ण-भक्ति के विविध पहलुओ
से सम्बद्ध है। इन छंदो को निम्नलिखित शीर्षको के अन्तर्गत विभाजित किया
गया है—
१ भक्ति-भावना, २. कृष्ण का अलौकिकत्व, ३. अनन्यभाव, ४ मिलन
१. रसखान जी भागकर वन में जा छिपे और विरन्दावन मे बास करके
हजारह, (सहस्रो) कवित विरन्दावन के, व सुभाव (स्वभाव, गुण) व
शोभा प्रिया-प्रियतम के तसनीफ (पुस्तक लिखकर) भेंट किये।

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समीक्षा भाग २७
५ बाललीला, ६. रूप-माधुरी, ७. प्रेम-लीला, ८. बंक-विलोचन,
६ मुसकान-माधुरी, १०. कृष्ण-सौन्दर्य, ११. रूप-प्रभाव, १२ कुंज-लीला,
१३. नटखट कृष्ण, १४. मुरली-प्रभाव, १५ कालिय-दमन, १६ चीर-हरण,
१७ प्रेमासक्ति, १६ प्रेम-बन्धन, १६. प्रेम-वेदना, २० रासलीला,
२१. फागलीला, २२. राधा-सौन्दर्य, २३. मानवती राधा, २४. सखी-शिक्षा,
२५. संयोग-वर्णन, २६. वियोग-वर्णन, २७. सपत्न-भाव, २८. कुवलयापीड-
भाव, २६. उद्धव-उपदेश, ३०. ब्रज-प्रेम, ३१ गंगा-महिमा, ३२.
शिव-महिमा।
१ भक्ति-भावना—यो तो रसखान के सभी छंद भक्ति-भावना से ओतप्रोत
है, किन्तु इस शीर्षक के अन्तर्गत रखे गये छंदो की भक्ति-भावना मे एक
विशेषता यह है कि इसमे कवि प्रत्यक्ष रूप से भक्त के रूप मे परिलक्षित होता
है। वह कृष्ण तथा उनकी जन्मभूमि ब्रज के प्रति अनन्य प्रेम प्रदर्शित करता
हुआ कहता है कि यदि मुझे मनुष्य को योनि मिले तो मै वही मनुष्य बन सकूँ
जो ब्रज के गोकुल गाँव मे निवास कर सकूँ, यदि पशु योनि मिले तो नन्द की
गाय बनूँ, यदि पत्थर का जन्म मिले तो गोवर्धन पर्वत की शिला बनूँ और
यदि पक्षी की योनि मिले तो यमुना-तट पर उगे हुए कदम्ब वृक्ष की डालो पर
बैठकर सानन्द चहचहाता रहूँ। रसखान अपने शारीरिक अंगो की सार्थकता
भी इसी मे मानते है कि वे ईश्वरोन्मुख हो। इसीलिए ये रसना की
सार्थकता कृष्ण-जाप मे, हाथो की कुंज-कुटीरो की सफाई करने मे ही
मानते है। अपने आराध्य देव कृष्ण की जन्मभूमि ब्रज से इन्हें इतना प्रेम है
कि उसके एक-एक कण पर ये समस्त सिद्धियो और समृद्धियो को न्यौछावर
करने की क्षमता रखते है। भक्त को अपने भगवान पर दृढ एव अटल विश्वास
होता है। उसकी सरक्षता प्राप्त करके वह स्वय को हर प्रकार के सकटो से
मुक्त मानता है। इसीलिए तो अपने माखन चाखनहारे के संरक्षण मे ये किसी
चुगल और लवार की चिन्ता नही करते। रसखान अपने प्रिय के रूप मे उसी
प्रकार एकाकार है जिस प्रकार गोपियाँ थी। उसके प्राण सदैव राधा और कृष्ण
के सरस एव नूतन प्रेम से सपृक्त है।
२. कृष्ण का अलौकिकत्व—कृष्णभक्त-कवियो ने कृष्ण को साकार मान-
कर उसके माधुर्य रूप की भक्ति की है, पर वे अपनी कविताओ मे यथावसर

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२८ रसखान-ग्रन्थावली
उसके अलौकिकत्व का प्रदर्शन भी करते रहे हैं। कृष्णकाव्य की यह प्रमुख
विशेषता है। सूरदास ने विस्तारपूर्वक कृष्ण के अलौकिकत्व का वर्णन किया
है। उदाहरण के लिए यह पद प्रस्तुत है—
'चरन गहे अंगुठा मुख मेलत ।
नद-घरनि गावति, हलरावति, पलना परिहरि मेलत ।
जे चरनारविंद श्री-भूषन, उर तैं नेकु न टारति ।
देखौ धौं का रस भरतनि को, सुर-मुनि करत विषाद ।
सो रस है मोहू कौं दुरलभ, तातै लेत स्वाद ।
उछरत सिंधु, धराधर काँपत, कमठ पीठ अकुलात ।
सेष सहसफन डोलन लागे, हरि पीवत जब पाइ ।
बढ्यौ वृक्ष वट सुर अकुलाने, गगन भयौ उत्पात ।
महा प्रलय के मेघ उठे करि, जहाँ-तहाँ आघात ।
करुना करी, छाँटि पग दीन्हौं, जानि सुरन मन त्रास ।
सूरदास प्रभु असुर-निकन्दन, दुष्टनि के उर त्रास ॥'
स्वच्छन्द-काव्यधारा के कवि भी इस प्रवृत्ति से उन्मुक्त नही हो सके है।
घनानंद कृष्ण के अलौकिकत्व का स्पष्ट संकेत देते हुए लिखते हैं—
'तोहि सब गावै एक तोही को बतावै वेद,
पावै फल ध्यावै जैसी भावनानि भरि रे ।
जल-थल व्यापी सदा अंतरजामी उदार,
जगत मे नाव जान राय रह्यौ परि रे ।
एते गुन लाय हाय छाय घनआनद यौँ,
कैधो मोहि दीस्यो निरगुन ही उघरि रे ।
जरौ विरहागिनि मैं करौं हाँ पुकार कासो,
दई गयी तू हूँ निरदई ओर ढरि रे ॥'
रसखान ने भी इस प्रवृत्ति का पालन किया है। कृष्ण के अलौकिकत्व
का प्रतिपादन करने वाले इनके आठ छंद उपलब्ध होते है जिनमें बताया गया
है कि जिस कृष्ण का जप शंकर जैसे महादेव करते है, जिसका
ध्यान करके ब्रह्मा अपने धर्म मे वृद्धि करते है, जिस पर देव, किन्नर और
पृथ्वी पर रहने वाली स्त्रियाँ अपने प्राणो को न्योछावर करके सजीवता प्राप्त

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समीक्षा भाग २६
करती है, जिसके गुणो का गान शेषनाग, गणेश, शिव, सूर्य, इन्द्र आदि निर-
न्तर करते रहते है, वेद जिसे अनादि, अनंत, अखड, अछेद्य, अभेद्य आदि
विशेषणो से विभूषित करते है, योगी, यति, तपस्वी जिसके लिए निरन्तर
समाधि लगाये रहते हैं, उसी कृष्ण को अहीर की छोकरियां थोडी-सी छाछ के
लिए नचाती है । इस प्रकार रसखान ने पूर्ण स्पष्टता के साथ कृष्ण के
अलौकिकत्व का प्रतिपादन किया है ।
३. अनन्य भाव—भक्त का अपने आराध्यदेव के प्रति अनन्य भाव होता
है, अर्थात् उसके लिए उसका आराध्य ही सर्वोपरि तथा सर्वश्रेष्ठ है । उसकी
इच्छा केवल उसे ही प्राप्त करने की होती है । उसके अतिरिक्त अन्य सारी
वस्तुएं उसकी दृष्टि मे नगण्य है, भले ही वे कितने ही महत्त्व की क्यो न हो ।
सूरदास ने भी कृष्ण के प्रति अपने अनन्य भाव की भक्ति को व्यक्त करत हुए
कहा है कि कृष्ण को छोडकर अन्य देवो की भक्ति करना कामधेनु को छोड़-
कर छेरी को दुहना है, अथवा परम गगा को छोडकर जलप्राप्ति के लिए
अन्यत्र कूप खोदना है । रसखान ने भी इसी अनन्य भाव को व्यक्त करते हुए
कहा है कि चाहे कोई शेष, सुरेश, दिनेश, गणेश, प्रजेश, महेश, भवानी की
अराधना करके अपने मनोरथो को पूर्ण कर ले, चाहे कोई लक्ष्मी की भक्ति
करके बहुत सारा धन एकत्र कर ले, चाहे तीनो लोक रहे या नष्ट हो जाये,
पर इनका एकमात्र आधार कृष्ण है और कृष्ण को छोडकर ये ससार के और
किसी पदार्थ की अभिलाषा नही करते । इस अनन्य भाव के पीछे कृष्ण की
भक्त-वत्सलता मुखरित है । जो कृष्ण द्रौपदी, गणिका, गृद्ध (जटायु), अजा-
मिल, अहिल्याबाई, प्रह्लाद आदि भक्तो का उद्धार करने वाले है, उनकी
शरण मे पहुँचकर आवागमन के दुखो से छूट जाना स्वाभाविक ही है । कृष्ण
अपने भक्तो का निरंतर ध्यान रखते है और उनकी रक्षा के लिए सदैव सन्नद्ध
रहते है, अत किसी भी व्यक्ति के लिए ऐसे कृष्ण ही सच्ची सम्पत्ति है,
ससार का ऐश्वर्य तो दुखद और नश्वर है । कोई भी मनुष्य, चाहे वह कितना
ही वैभव-सम्पन्न क्यो न हो, पर यदि वह कृष्ण-भक्ति से विमुख है तो उसकी
सम्पूर्ण सम्पन्नता व्यर्थ और निस्सार है ।
४. मिलन—इस शीर्षक से सम्बन्धित छदो के अन्तर्गत रसखान ने राधा-

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३० रसखान-ग्रन्थावली
कृष्ण के मिलन का वर्णन किया है । वैष्णव भक्ति-पद्धति के अनुसार कृष्ण
भगवान है और राधा उनकी शक्ति । बिना शक्ति के भगवान के ईश्वरत्व की
सम्पूर्णता कुंठित रहती है और कृष्ण को सम्पूर्ण ईश्वर बनाने के लिए उनका
राधा से मिलन अनिवार्य है । सभी कृष्णभक्त-कवियो ने राधा-कृष्ण-मिलन का
वर्णन किया है । रसखान ने भी तीन सवैयो मे इस परम्परा का निर्वाह
किया है ।
५. बाललीला— हिन्दी में प्रचलित कृष्ण काव्यधारा के अन्तर्गत कृष्ण के
माधुर्य रूप का ही मुख्यतया वर्णन किया गया है । श्रत इनके काव्यो मे बाल-
लीला की प्रमुखता है। सूरदास तो इस क्षेत्र के सम्राट् ही माने जाते है । रस-
खान ने भी कृष्ण की बाललीला से सम्बद्ध कुछ छंद लिखे है, पर ये संख्या में
बहुत ही कम है । प्रस्तुत संकलन मे इस विषय के केवल चार छंद है, और
अभी तक एतद्विषयक ये ही छंद प्राप्त भो हुए है । पहले छंद मे कृष्ण की छठी
के उत्सव का वर्णन है । दूसरे छंद मे कृष्ण की उस अवस्था का वर्णन है, जब
कृष्ण कुछ बडे हो जाते है और पैरो चलने लगते हैं । यशोदा जी उनके साथ
खिलवाड करती है और 'ता' शब्द कहकर गौओ के पीछे छिप जाती है । कृष्ण
उन्हे ढूँढते हैं, पर जब यशोदा जी उन्हे नही मिलती तो वे उठकर पृथ्वी पर
लेट जाते है । तब यशोदा जी उन्हे गोद मे उठा लेती है । तीसरे छंद मे कृष्ण
की सज्जा का वर्णन है। यशोदा जी उनके शरीर मे तेल लगाती है, आंखो मे
अंजन लगाती हैं और साथ ही डिठौना भी लगा देती है ताकि उसके लाडले
पुत्र को किसी की नजर न लग जाये । चौथे सवैया मे कृष्ण की उस अवस्था
का वर्णन है जब वे काफी बड़े होकर खेलने के लिए घर से बाहर निकलने
लगते है। उनका शरीर धूल से सना हुआ है । वे खेलते और खाते हुए
अपने प्रागण मे घूम रहे है कि अचानक एक कौवा आता है और उनके हाथ
से माखन तथा रोटी छीनकर ले जाता है ।
६. रूप-माधुरी — 'रूप-माधुरी' शीर्षक के अन्तर्गत उन छंदो का वर्णन है
जिनमे कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन किया गया है । इस वर्णन मे कोई विशेषता
अथवा मौलिकता नही है, वरन् जैसा वणन अन्य कृष्ण-भक्त-कवियो ने
किया है, वैसा ही रसखान ने भी किया है । हृदय पर सुशोभित मोतियो की
माला, लटकती हुई घुँघराली अलके, सिर पर मुकुट, होठो पर मुरली, मस्तक

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समीक्षा भाग ३१

पर गोरज, वाणी मे माधुर्य आदि । कृष्ण की शोभा को बढ़ाने वाली प्रायः
उन्ही क्रियाओ का वर्णन किया गया है, जो कृष्ण-काव्य मे परम्परागत रूप से
वर्णित होती आई है। कुंजो से निकलना, अन्य गोपियो के साथ छेड़खानी
करना, कदम्ब वृक्ष पर चढकर बॉसरी बजाना, कटाक्ष करना, मुस्कराना,
आदि क्रियाएँ कृष्ण-काव्य की चिर-परिचित क्रियाएँ है । रसखान का यह
वणन सश्लिष्ट है, अर्थात् इन्होने कृष्ण-सौन्दर्य का वर्णन प्रत्येक अग अथवा
क्रिया को अलग-अलग लेकर नही किया है, वरन् सबका एक साथ वर्णन
किया है।
७. प्रेम-लीला—प्रेम-लीला के अन्तर्गत वस्तुत कृष्ण के सौन्दर्य के द्वारा
आकृष्ट गोपियो की प्रेमानुभूति का वर्णन है। प्रत्येक गोपी अपनी सखी से
उसी सौन्दर्यजन्य प्रभाव का वर्णन करती है। यदि कोई गोपी अधीर होकर
कदम्ब और करील के वृक्षो से पूछती है कि तुम्हारे साथ रहने वाला कृष्ण
कहाँ गया तो एक गोपी अपनी सखी से अपनी प्रेम-दशा का वर्णन करती हुई
कहती है कि कृष्ण की भौहे भरी हुई थी, पलके सुन्दर थीं, अधर लाल थे ।
उसके कानो मे कु डल थे जो हिल-डुलकर कृष्ण के कपोलो की शोभा को द्विगु-
णित कर रहे थे। वह मुस्कराता हुआ कुंजो मे से निकला और उसे देखते
ही गोपियाँ मूच्छित हो गईं अर्थात् अपनी सुधि-बुधि भूल गई । दही का
मटका सिर से गिरकर फूट गया। कही अवसर पाकर कृष्ण गोपियों को घेर
लेते है । उनका मटके फोड देते है और अपनी मधुर वाणी तथा आकर्षक
क्रियाओ से उन्हे मुग्ध करके अपने वश मे कर लेते है । कृष्ण के इस अपार
सौन्दर्य का प्रभाव गोपियों पर इतना अधिक पडता है कि वे उसे देखकर लोक
और कुल की मर्यादा को तिलाजलि दे देती है और जब भी कृष्ण को देखती
है, वे उसकी ओर इस प्रकार दौडती है जैसे नदी निर्बाध गति से सागर की
ओर भागती है। उसके रूप-सौन्दर्य का ध्यान आने से ही वे स्वयं को भूल
जाती है। सास के त्रासो की, ननद के तीक्ष्ण व्यग्यो की उन्हे कोई चिन्ता नही
रह जाती । कहने का भाव यह है कि वे पूर्णतया कृष्ण के हाथो बिक
जाती है।
८. बंक-विलोचन—प्रेम-व्यापार मे वक्र दृष्टि का महत्त्वपूर्ण स्थान है,
इसीलिए साहित्य मे इस प्रकार की दृष्टि का और इसके-द्वारा उत्पन्न प्रभाव

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३८ रसखान-ग्रन्थावली
का अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है । गोपियां कृष्ण के सौन्दर्य मे ही
नहीं वरन् उनकी वक्र दृष्टि भी उन्हे प्राकुल किये रहती है । जिस गोपी ने
भी कृष्ण की दृष्टि को देख लिया, वह फिर कृष्ण से पृथक न हो सकी, भले
ही उसे लोक-लाज को तिलांजलि देनी पडी, सास और ननद के त्रासो को
सहना पड़ा । कृष्ण की दृष्टि मे ही कुछ ऐसा जादू है कि वह एक वार भी
जिस गोपी की ओर देख लेता है, उसी के मन को चुरा लेता है ।
६. मुसकान माधुरी—प्रेम के व्यापार मे जितना महत्त्व वक-विलोचन का
है, उतना ही मुसकान के माधुर्य का भी है । गोपियो को वशीभूत करने वाले
जहाँ कृष्ण के अन्य गुण है, वहाँ मुसकान का माधुर्य भी है । जिसने भी इस
मुसकान को देख लिया, यह फिर उसके दिल मे ऐसी गडी कि निकाले से नहीं
निकली । इस मुसकान का कोई मूल्य भी तो नहीं, संसार के समस्त रत्नागार
इस पर न्यौछावर किये जा सकते है । खरिक मे जाकर कृष्ण की मुसकान
देखने वाली गोपी की जो दशा होती है, उसका वर्णन करती हुई एक गोपी
अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! अभी-अभी वह गौशाला मे गाय का
दूध निकालने के लिए गई थी, लेकिन वह अपने हाथ के दूध के पात्र को फेंक-
कर पागल-सी होकर वापम आ गई है । उसकी दशा को देखकर कोई गोपी तो
यह कहती है कि उसे किसी ने छल लिया है, कोई कहती है कि वह स्तब्ध हो
गई है, कोई कहती है कि वह डर गई है, कोई कहती है कि वह अंधी हो गई
है । उसको अच्छा करने के लिए सास अनेक प्रकार के व्रतो को करने का
सङ्कल्प करती है, ननद दौड़-दौड़कर सयानो को बोलकर लाती है । सारी
सखिया उसकी मूर्च्छा को पहचानकर हंसती है और कहती है कि इसने
आनन्द-सागर कृष्ण की वही मुस्कराहट को देख लिया है और यह उसी का
प्रभाव है । एक अन्य गोपी अपनी सखी से कृष्ण की मुसकान के प्रभाव का
वर्णन इन शब्दो मे करती है कि हे सखि ! वह कामदेव के समान मधुर वाणी
बोलती है । उसके शरीर पर पीला वस्त्र सुशोभित है । उसके शरीर की कान्ति
इस प्रकार चमकती और दमकती है, मानो काले बादलो मे बिजली चमक
रही हो । उसके मुख का सौन्दर्य और मुसकान कुलांगनाओ की लज्जा को नष्ट
करने मे पूर्णतया समर्थ है ।

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समीक्षा भाग ३३
इस प्रकार गिने-चुने छन्दो मे रसखान ने कृष्ण की मुसकान का अत्यन्त
प्रभावशाली वर्णन किया है।
१० कृष्ण-सौन्दर्य--प्रत्येक कृष्णभक्त-कवि ने कृष्ण के सौन्दर्य का
वर्णन किया है, पर यह वर्णन इतना अधिक परम्पराबद्ध हो गया है और सूर
ने इसका इतने अधिक विस्तार से वर्णन कर दिया है कि आगे के कवियो को
नवीनता के लिए गुंजायश ही नही रह गई। कृष्ण-सौन्दर्य के उपकरण प्राय:
रूढिबद्ध हो गये है—मोर-मुकुट, वैजन्तीमाला, कु डल, पीताम्बर, वक्रदृष्टि,
मधुर मुस्कान आदि । रसखान भी इस परम्परा से बाहर नही निकल पाये है।
इन्होने कृष्ण-सौन्दर्य का विवरण इस प्रकार प्रस्तुत किया है . कृष्ण के सिर
पर मोरपखो का मुकुट और कानो मे कुंडल सुशोभित है । उनके केशो की
शोभा उनके कपोलो पर बिखरी हुई है । वह दुख का हरण करनेवाली तथा
मन को मोहनेवाली है। उनकी वक्रदृष्टि आनद देनेवाली और विशाल है।
उनका श्याम शरीर नवीन विशाल बादल के समान है जिस पर पीले वस्त्र की
शोभा बहुत ही प्रभावशाली है ।
जिस प्रकार कृष्ण के अग और आभरण रूढिबद्ध हो गये है, उसी प्रकार
उनकी क्रियाएँ परम्परा से बँध गई है गौओ का चराना, गोधन गाना, बाँसुरी
बजाना, वक्र दृष्टि से देखना, मुस्कुराकर चलना आदि । इन सौन्दर्यवर्द्धक
क्रियाओ के अन्तर्गत भी रसखान अधिकाशत. परम्परावादी ही रहे है ।
११ रूप-प्रभाव—कृष्ण के अमित अग-सौन्दर्य को तथा उनकी क्रियाओ
के माधुर्य को देखकर कोई भी ब्रजवासी ऐसा नही है जो उनसे अप्रभावित रह
सकता है, विशेषत. गोपियाँ तो एकदम अपनी सुधि-बुधि भूल जाती है। कृष्ण
के रूप-प्रभाव का उपयोग सयोग और वियोग दोनो ही स्थितियो मे किया
गया है । सयोग मे गोपियाँ उनके रूप को देखते ही किकर्त्तव्यविमूढ बन जाती
है और अपने होश-हवाश गँवा बैठती है । अपनी प्रेमदशा का वर्णन करती हुई
कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! कृष्ण का यौवन कामदेव की शोभा
से भरा हुआ है । उनकी मनोहर मूर्ति सदैव आँखो मे समाई रहती है। उन्होने
मुझसे जो प्रेमभरी बाते की थी, वे मन की मन मे ही रह गई है, अर्थात् मैं
उन्हे किसी से कह नही पाती । प्रेम की घाते हृदय के बीच मे अडी हुई है । कृष्ण
के वियोग मे मेरी आँखो मे सारी रात आँसुओ की लड़ी रहती है, अर्थात् मै

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३४ रसखान-ग्रन्थावली

रातभर कृष्ण का स्मरण करके रोती रहती हैं। किसी-किसी गोपी पर कृष्ण
के रूप का प्रभाव इतना पड़ा है कि वह बिना मोल ही कृष्ण के हाथों बिक
गई है। उसके लिए नंदपुत्र कृष्ण कामदेव से भी अधिक मनोहर हैं, उनकी
वक्रदृष्टि प्रेम के पाश मे बाँधनेवाली है, उनके मुख की सुन्दरता से करोड़ों
चन्द्रमा पराजित हो गये हैं। इसीलिए कोई गोपी तो अपनी सखी के
सामने अपनी आँखें इसलिए नही खोलती कि उनमें कृष्ण की छवि बसी हुई
है। अतः जब भी गोपियाँ कृष्ण को देखती हैं, उनके नेत्र बरबस उनकी ओर
दौड़ पड़ते हैं, ठीक बिहारी की नायिका के उन नेत्रों के समान जो लाज-
लगाम का शासन नहीं मानते। यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि कतिपय छंदों
मे ही रसखान ने रूप-प्रभाव का जो वर्णन कर दिया है, वह हृदय को प्रभावित
करने के लिए काफी है।
१२ कुंज लीला—कुंजलीला का वर्णन भी परम्परागत है। कोई गोपी
अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! आज प्रातःकाल जब मैं कुंजगली मे
निकली तो अचानक कृष्ण से भेंट हो गई। कृष्ण के मुख की मुस्कान मे
मेरा मन इतना डूब गया कि उसकी छवि पर से हटाने से भी नही हटा। उस
मुस्कान ने मेरे नयनों को बाँध लिया, चित्त को चुरा लिया और प्रेम का गहरा
फंदा डाल दिया। इस प्रकार के वर्णन मे कोई नवीनता तथा मौलिकता नहीं है।
१३ नटखट कृष्ण—इस शीर्षक के अन्तर्गत संकलित छंदों मे कृष्ण के
नटखटपन का वर्णन है। यह वर्णन कही गोपियों की सहज स्वाभाविकता से
परिपूर्ण है और कहीं तीक्ष्ण व्यंग्य से। कोई गोपी कृष्ण की भर्त्सना करती हुई
कहती है कि हे कृष्ण ! तुम और किसी जगह से नही आये हो। तुम्हारा जन्म
हमारे इसी गाँव मे हुआ है। बचपन मे हमने तुम्हे दूध पिला-पिलाकर माँ-बाप की
तरह पाला है। उसी पहिचान और मर्यादा को तुम छोड़ना चाहते हो। तुम
बचपन मे द्वार-द्वार पर नाचा करते थे और अब हमारे सामने अपनी आँखें
नचा रहे हो। तुम्हे तुम्हारी माँ की सौगन्ध है, यदि तुमने हमारी मटकी
उतारी। हमे न तो अपनी इस मटकी के उतर जाने का सोच है, न गोरस
बिखर जाने का और न वस्त्रों के फट जाने का। हमे दुःख तो इस बात का
है कि तुम हमारे होकर ही हमे इतना तंग करते हो। इन वाक्यो मे गोपियों के

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समीक्षा भाग ३५
मन की सहज स्वाभाविकता वर्णित है। इसी प्रकार एक अन्य गोपी कृष्ण के
नटखट व्यवहार की शिकायत अपनी सखी से करती हुई कहती है कि कृष्ण
एक से बढ़कर एक शरारतियो को अपने साथ लेकर वन मे घूमता रहता है।
वह जितनी शरारते करता है, उनका वर्णन नही किया जा सकता । वह न तो
किसी की अनुनय-विनय पर ध्यान देता है और न किसी प्रकार की मान-मर्यादा
की ही लज्जा करता है। आती-जाती गोपियो की दधि-मटकियाँ फोडकर उन्हे
कृष्ण ने जिस प्रकार तग किया है, उस सबका वर्णन इस शीर्षक के अंतर्गत
संकलित छन्दो मे मिलता है।
१४. मुरली-प्रभाव - वैष्णव सम्प्रदाय के अन्दर मुरली को भगवान् की
वशीकरण शक्ति माना गया है। कृष्ण जब भी मुरली बजाते है, तब जड
और चेतन स्थिर बन जाते है। ब्रज की गोपियो की दशा तो विलक्षण ही हो
जाती है। मुरली की ध्वनि सुनते ही गोपियाँ अपना काम करना छोड़ देती है,
अतः दुहा हुआ दूध ठंडा पड जाता है, जामन दिया हुआ दूध रखा-रखा ही
खटा जाता है। सभी के हाथ-पैर अपना-अपना काम करना छोड़ देते है। यह
दशा नारियो की ही नही, बल्कि पुरुषो की भी हुई । कहने का भाव यह है कि
सारा ब्रज ही व्याकुल हो गया । उसकी समस्त व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई।
इसी प्रकार एक अन्य गोपी मुरली-प्रभाव का वर्णन अपनी सखी से करती हुई
कहती है कि चन्द्रमा के समान सुन्दर मुखवाले, कामदेव के समान सुन्दर कृष्ण
के मधुर वचनो ने मेरा मन मोह लिया है। उसकी बाँकी चितवन को देखकर
मैं संज्ञाशून्य हो गई और कुल की मर्यादा छोड़ बैठी । इसीलिए गोपियाँ चाहती
हैं कि कोई व्यक्ति कृष्ण के हाथ से बाँसुरी छीनकर उसे जला डाले, तभी वे
उससे छुटकारा पा सकती है। कृष्ण अपनी बाँसुरी से इतना अधिक प्रेम करते
है कि वे हर समय उसे अपने अधरो से लगाये रहते हैं। इससे गोपियो के मन
मे बाँसुरी के प्रति ईर्ष्या-भाव उत्पन्न हो गया है। वे तो यह चुनौती भी दे
देती हैं कि ब्रज मे या तो हम रहेगी या यह कृष्ण-प्रिया बाँसुरी ही रहेगी।
इस प्रकार काफी विस्तार के साथ रसखान ने मुरली-प्रभाव का वर्णन
किया है।
१५. कालियदमन - कृष्ण की अन्य प्रमुख लीलाओ के अन्तर्गत कालिय-
दमन लीला भी प्रमुख है। सूरदास ने इस लीला का विस्तार से वर्णन किया

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३६ रसखान-ग्रन्थावली
है, पर रसखान के इस विषय में केवल दो छंद ही प्राप्त हैं। एक छंद में
यशोदा जी का विलाप है और दूसरे छंद में कृष्ण द्वारा नाग पर विजय कर
लेने के कारण ब्रज-वासियों की प्रसन्नता को व्यक्त किया गया है ।
१६. चीरहरण — चीरहरण-लीला के अन्तर्गत रसखान का केवल एक छंद
प्राप्त है ।
१७. प्रेमासक्ति — इस लीला के अन्तर्गत रसखान के ११ छंद उपलब्ध हैं ।
इन छंदों में कृष्ण के सौन्दर्य ने, उनकी क्रियाओं ने और उनकी मुरली की वशी-
करण ध्वनि ने गोपियों को इतना आकृष्ट कर लिया है कि वे बिना कृष्ण के
जल-रहित मीन की भांति छटपटाती रहती हैं। अपनी प्रेमावस्था का
वर्णन एक गोपी अपनी सखी से करती हुई कहती है कि कृष्ण जब गाये चरा-
कर सांझ को घर लौटते हैं तो उनकी मधुर वाणी, तीक्ष्ण कटाक्ष आदि मेरे
हृदय पर इतना अधिक प्रभाव डालते हैं कि मैं यह सोचने लगती हूँ कि कितना
अच्छा होता, यदि मेरा हृदय पृथ्वी का वह टुकड़ा होता जहां काछनी पहनकर
कृष्ण क्रीड़ाएं किया करते हैं। इसी प्रकार एक अन्य गोपी कहती है कि जब
से मैंने कृष्ण के मुकुट, मुरली, वनमाला को देखा है, तब से मैं उनमें इतनी
आसक्त हो गई हूँ कि कुल तथा लोक की लाज का भी ध्यान नहीं करती । मैं
ही क्या, ब्रज की समस्त गोपियों की यही दशा है। प्रेम का यह बंधन इतना
दृढ़ हो गया है कि अब चाहे कोई लाख प्रयत्न करे, पर यह टूट नहीं सकता।
वस्तुस्थिति तो यह है कि मैं कृष्ण के रंग में ऐसी रंग गई हूँ कि अब मेरे
लिए अन्य कोई रंग ही शेष नहीं रह गया है ।
अतः यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि रसखान ने प्रेमासक्ति का जिस प्रकार
वर्णन किया है वह अत्यन्त स्वाभाविक, प्रभावोत्पादक एवं परम्परागत है ।
१८. प्रेम-बंधन प्रेमासक्ति में आकृष्ट होने की भावना अधिक होती
है। जब यह आकर्षण दृढ़ रूप धारण कर लेता है और हृदय पर अपना अधि-
पत्य जमा लेता है तो बंधन का रूप बन जाता है। कहने का भाव यह है कि
प्रेमासक्ति से अगला सोपान प्रेम-बंधन का है। जो गोपियां कृष्ण की ओर
आकृष्ट हुई थीं, कालान्तर में वे ही उनके प्रेम में बंदिनी बन गईं । गोपियों
की इस दशा का वर्णन रसखान ने बड़े ही कौशल के साथ किया है। गोपियां
इस बंधन में इतनी जकड़ गई हैं कि वे प्रीति की रीति में लाज का कोई स्थान