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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

by रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र

DevanagariBrajpublished368 pages

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समीक्षा भाग २७
५ बाललीला, ६. रूप-माधुरी, ७. प्रेम-लीला, ८. बंक-विलोचन,
६ मुसकान-माधुरी, १०. कृष्ण-सौन्दर्य, ११. रूप-प्रभाव, १२ कुंज-लीला,
१३. नटखट कृष्ण, १४. मुरली-प्रभाव, १५ कालिय-दमन, १६ चीर-हरण,
१७ प्रेमासक्ति, १६ प्रेम-बन्धन, १६. प्रेम-वेदना, २० रासलीला,
२१. फागलीला, २२. राधा-सौन्दर्य, २३. मानवती राधा, २४. सखी-शिक्षा,
२५. संयोग-वर्णन, २६. वियोग-वर्णन, २७. सपत्न-भाव, २८. कुवलयापीड-
भाव, २६. उद्धव-उपदेश, ३०. ब्रज-प्रेम, ३१ गंगा-महिमा, ३२.
शिव-महिमा।
१ भक्ति-भावना—यो तो रसखान के सभी छंद भक्ति-भावना से ओतप्रोत
है, किन्तु इस शीर्षक के अन्तर्गत रखे गये छंदो की भक्ति-भावना मे एक
विशेषता यह है कि इसमे कवि प्रत्यक्ष रूप से भक्त के रूप मे परिलक्षित होता
है। वह कृष्ण तथा उनकी जन्मभूमि ब्रज के प्रति अनन्य प्रेम प्रदर्शित करता
हुआ कहता है कि यदि मुझे मनुष्य को योनि मिले तो मै वही मनुष्य बन सकूँ
जो ब्रज के गोकुल गाँव मे निवास कर सकूँ, यदि पशु योनि मिले तो नन्द की
गाय बनूँ, यदि पत्थर का जन्म मिले तो गोवर्धन पर्वत की शिला बनूँ और
यदि पक्षी की योनि मिले तो यमुना-तट पर उगे हुए कदम्ब वृक्ष की डालो पर
बैठकर सानन्द चहचहाता रहूँ। रसखान अपने शारीरिक अंगो की सार्थकता
भी इसी मे मानते है कि वे ईश्वरोन्मुख हो। इसीलिए ये रसना की
सार्थकता कृष्ण-जाप मे, हाथो की कुंज-कुटीरो की सफाई करने मे ही
मानते है। अपने आराध्य देव कृष्ण की जन्मभूमि ब्रज से इन्हें इतना प्रेम है
कि उसके एक-एक कण पर ये समस्त सिद्धियो और समृद्धियो को न्यौछावर
करने की क्षमता रखते है। भक्त को अपने भगवान पर दृढ एव अटल विश्वास
होता है। उसकी सरक्षता प्राप्त करके वह स्वय को हर प्रकार के सकटो से
मुक्त मानता है। इसीलिए तो अपने माखन चाखनहारे के संरक्षण मे ये किसी
चुगल और लवार की चिन्ता नही करते। रसखान अपने प्रिय के रूप मे उसी
प्रकार एकाकार है जिस प्रकार गोपियाँ थी। उसके प्राण सदैव राधा और कृष्ण
के सरस एव नूतन प्रेम से सपृक्त है।
२. कृष्ण का अलौकिकत्व—कृष्णभक्त-कवियो ने कृष्ण को साकार मान-
कर उसके माधुर्य रूप की भक्ति की है, पर वे अपनी कविताओ मे यथावसर