रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
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चंचल चितौनि, चित्त अचल, सुभाव साधु,
सकल असाधु भाव काम की कथान की।
बेचति फिरति दधि, लेत, तिन्हें मोल लेति,
अद्भुतरस-भरी बेटी वृषभान की।३४।
शब्दार्थ-बैस = (वयस्) वय, उम्र। तरुन = (तरुण) तीव्र,
अत्यधिक। बानी लघु = बातें थोड़ी कहती है। परमान = परे का मान, बहुत
बड़ा। परमान की = अत्यंत कुशाग्र (बुद्धि)। उरज = स्तन। बलबीर = बल
में वीर (बली); बलराम के भाई (श्रीकृष्ण)। बलबीर-बंधन-विधान की =
बलबीर को बाँधने (वशीभूत करने) का विधान करनेवाली है। साधु =
भला, सीधा। असाधु = बुरा, टेढ़ा।
भावार्थ- (सखी की उक्ति नायिका प्रति) हे सखी, तेरी वय तो
बाल्य है, पर तेरी (अंग) दीप्ति तरुण (प्रखर) है। तेरी बातें थोड़ी होती
हैं, पर वे बुद्धि की पराकाष्ठा (वाली बातों) का वर्णन करती हैं। तेरा
निर्मल हृदय तो कोमल है पर स्तन कठोर (कड़े) हैं। तू जाति की तो
अबला (स्त्री, निर्बल) है पर बलबीर (श्रीकृष्ण, बली) के बाँधने का
भी विधान करनेवाली है। तेरी चितवन चंचल है, पर चित्त निश्चल (स्थिर)
है। तेरा स्वभाव तो सीधा है, पर काम की कथा के सभी टेढ़े भाव तुझमें
पाए जाते हैं। तू दही तो देती (बेचती) फिरती है, पर जो उसे मोल लेते
(खरीदते) हैं, तू उनको ही मोल लेती है (वे तुझ पर मुग्ध हो जाते हैं)।
तू वृषभानु की बेटी अद्भुतरस से भरी हुई है।
अलंकार - विरोधाभास।
अथ प्रच्छन्न, यथा- (कवित्त)
(४६८) ब्रज की कुमारिका द्वै लीने सुक-सारिका,
पढ़ावैं कोक-कारिकानि केशव सबै निवाहि।
गोरी गोरी भोरी भोरी थोरी थोरी बैस, फिरैं
देवता सी दौरी दौरी आई चोरा चोरी चाहि।
बिन गुन तेरी आनि भ्रुकुटी कमान तानि,
कुटिल-कटाक्ष-बान बड़ो अचरज आहि।
एते मान ढीठ ईठ नेश को अडीठ मनु,
पीठ दै दै मारतों पे चूकती न कोऊ ताहि ।३५।
शब्दार्थ - सुक = सुग्गा। सारिका = मैना। कोक-कारिका = कोक-
शास्त्र के सूत्र। सबै निवाहि = पूरा निर्वाह करके, भली भाँति। चाहि
३४-बानी-बानि। बरनत-बरतन। ३५-चोरा चोरी-चोरी चोरा।
कुटिल-नयन। मान-पर।