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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

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DevanagariHindipublished286 pages

Page 258 of 286

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Page 258

२६२ रसिकप्रिया
को मानसरोवर त्याग देना पड़ा, बेल कठोर हो गया, केसर पीली पड़ गई,
अनार का हृदय फट गया । कनक = सोना (वर्ण) । तन = शरीर । तनक० =
थोड़ा थोड़ा करके अर्थात् (अत्यंत कष्ट सहकर) । ससि = चंद्रमा (मुख) ।
घटत बढ़त = भय से घटता है, कृपा करेंगी इस आशा से बढ़ता है । बंधुजीव =
फूल दुपहरिया, गुल्लाला (तलवों की ललाई) । गंधहीनो = गंधरहित ।
कोबिद = पंडित, चतुर ।
वचन-सखी की उक्ति सखी से । राधिका के निकट ही वह दूसरी
सखी से ये बातें करती है जिससे कोप छूट जाय ।
सूचना-राधिका ने सौत पर कोप किया है ।
श्रीकृष्ण जू को रौद्ररस, यथा-(कवित्त)
(४८६) मीडि मार्यो कलह, बियोग मार्यो बोरिकै,
मरोरि मार्यो अभिमान भार्यो भय भान्यो है।
सबको सुहाग अनुराग लटि लीनो दीनों,
राधिका कुँवरि कहँ सब सुख सान्यो है।
कपट कपटि डार्यो निपट कै औरनि सों,
मेटी पहिचानि मन में हू पहिचान्यो है।
जीत्यो रतिरन मथ्यो मनमथहू को मन,
केसोदास कौन कहुँ रोष उर आन्यो है। २३।
शब्दार्थ-मींडि मारयो कलह = कलह को मींजकर मार डाला ।
बोरिकै = डुबोकर । भारयो भय भान्यो है = भारी भय को भी भंग कर डाला
है । कपट = छल । कपटि डारयो = नोच लिया । निपट कै = एकदम । मन
में हू = मन से भी । मेटी पहिचानि मन में हू पहिचान्यो हैं = मन से भी
जानने की पहचान मिटा दी है ।
भावार्थ- (सखी की उक्ति नायक से) आपने कलह को मींजकर मार
डाला, वियोग को डुबोकर मारा, अभिमान को मरोड़ फेंका, भारी भय का
भी अंगभंग कर दिया, सबका सौभाग्य और अनुराग लूटकर राधिका कुमारी
को देकर उन्हें सब प्रकार के सुख से युक्त कर दिया है । कष्ट को तो एकदम
नोच कर फेंक दिया, औरों को मन द्वारा पहचानने की पहचान भी मिटा
दी है और रति के युद्ध में कामदेव का भी मन मथ डाला है (क्रोध करके
जैसी वीरता दिखाई जाती है वैसी तो आप दिखा चुके) अब किसके लिए
रोष हृदय में ले आए हैं (अब किसे नष्ट करना या जीतना है)। (युद्ध के
पक्ष में 'मींडि डार्यो' आदि का शब्दार्थ लिया गया है, प्रकृत अर्थ इस प्रकार
२३-मारयो-मारौ । मैं हूँ-केहूँ । केसोदास-केसौराइ । कहुँ-हूँ पै ।