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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

DevanagariHindipublished286 pages

Page 184 of 286

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Page 184

१८८ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—खोरि = दोष । खोरि = गली । घनी = अनेक । घरनीनि =
स्त्रियाँ ।
भावार्थ—( नायक के गुरुमान करने पर बहिरंग सखी की उक्ति नायिका
से ) अगर कोई शिकायत करनी ही हो तो अपने लोगों से अपने ही सामने
( एकांत में ) उसे कहते हैं । यह नहीं कि उसके दोषों का खजाना गलियों में
खोलने लगें ( गली गली सबसे दोष कहते फिरना अनुचित है ) । यदि किसी
की दृष्टि किसी की ओर जाती है तो इतना ही किया जा सकता है कि वह
उधर जाने से रोक ली जाय, यह तो हो नहीं सकता कि चाकू लेकर नेत्र ही
तराश दिए जायें । ( आज तो तू ऐसी बातें करके उन्हें क्रुद्ध कर रही है और
वियोग सहा रही है ) पर क्या जानती नहीं कि ये वे ही घनश्याम हैं जिनके
घड़ी भर के वियोग के कारण अनेक स्त्रियों की ऐसी दशा हो जाया करती
थी कि उनकी विरहाग्नि शांत करने के लिए कपूर घोलने की आवश्यकता
पड़ जाती थी । तू कैसी बातें करने लगी है, तुझे इस प्रकार बोलना चाहिए
जिस प्रकार साधारणतया बोलते हैं । मोल लिए हुए के प्रति भी क्या ऐसी
बातें कही जाती हैं, जैसी बातें तूने अपने प्रिय श्रीकृष्ण के प्रति कही हैं ?
( जो तेरे प्रेम में बिक चुका उसे ऐसी कड़ी बातें ! ) ।
सूचना—सखी की उक्ति से स्पष्ट है कि नायिका ने ऐसी बातें कही हैं
जैसी साधारणतः लोकमर्यादा के विरुद्ध हैं । श्रीकृष्ण की ओर से सखी
उलाहना दे रही है । वह बहिरंग है अतः प्रकाश गुरुमान है ।
अथ लघुमान-लक्षण—( दोहा )
(३४७) देखत काहू नारि-त्यों, देखै अपने नैन ।
तहँ उपजत लघुमान कै, सुनै सखी के बैन ।६।
शब्दार्थ—त्यों = ओर ।
भावार्थ—स्वयम् अपनी आँखों से किसी दूसरी स्त्री की ओर देखते हुए
नायक को देख लेने पर या ऐसी बात सखी से सुनने पर लघुमान उत्पन्न
होता है ।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न लघुमान, यथा—( सवैया )
(३४८) कान्ह तिहारी वा प्रानप्रिया कें अयान सयान सबै मन माहीं ।
मान किधौँ अपमान अबै यह मानस पै अनुमाने न जाहीं ।
सुख दुख्ख न केसव जानि परै समुझ रिस हास न हाँ अरु नाहीं ।
यों खिन ही सियरी खिन ताती है ज्यौं बदलै बदरानि की छाहीं ।१०।
६—उपजत—उपजै । सखी के—सखीये । १० — मानस पै—मान लखौ ।
अनुमाने—पहिचाने । न हां—नहीं अरु माहीं । यों—जो । ही—में । है—सो, सु ।
बदरानि—बदरान ।