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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

DevanagariHindipublished286 pages

Page 162 of 286

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Page 162

अष्टम प्रभाव १६५
का परिणाम यह होगा कि मैं दिन प्रतिदिन दुःख ही पाऊँगी । मैं तो अपने इ
हृदय में ही उनके शरीर को देख लेती हूँ। यदि उन्हें देखूँगी तो अधिकाधिक
देखने लगूँगी । इस प्रकार मैं उनके शरीर को छिपकर ही देखूँगी (उनके
रूप का ध्यान यहीं एकांत में कर लूँगी ) । अपनी देह तक मैं उन्हें न देखने
दूँगी । तू जो मुझे देखने के लिए फुसला रही है, मानो तेरे फुसलाने से मैं
अब कुछ उन्हें देख ही लूँगी (बड़ी दिखानेवाली आई है, जा तेरे दिखाने से
तो मैं देखने से रही ! ) ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न अभिलाष, यथा—( सवैया )
(२६४) पाइ परौं बलि जाउँ मनोहर आपुन सी न करौ अब ताहू ।
देखें अघात नहीं दिन के फिरि बारक लौं अनदेखें ही जाहू ।
मो सों कही सु कही अब केसव कैसहूँ कान्ह पत्याव न काहू ।
दाढ़हूगे जु कहूँक इति रुचि तातो है नेक सिराइ धौं खाहू । १३।
शब्दार्थ—मनोहर = मन को हरनेवाले (श्रीकृष्ण) । आपुन सी = अपने
समान बदनाम । ताहू = उसे (नायिका को) भी । अघात नहीं = तृप्त नहीं
होते । दिन के = दिन भर के समय में । बारक लौं = कई दिनों तक ।
पत्याव न काहू = किसी का ऐसा विश्वास मत करना । डाढ़हुगे = जलोगे ।
कहूँक = कहीं । रुचि = लालसा । तातो = गरम । नेक = जरा । सिराइ धौं
खाहु = कुछ ठंडा करके खाओ । धौं = तो ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायक प्रति ) हे मनमोहन, आपने मुझसे
जो कहा सो कहा अब और किसी का विश्वास करके ऐसा मत कहिएगा । मैं
आपके पैरों पड़ती हूँ और बलिहारी जाती हूँ। अब उसे (नायिका को) भी
अपना सा मत बना डालिए । जब उसे दिनदिन भर देखकर आपकी तृप्ति नहीं
होती तो कहीं फिर कई दिनों तक बिना देखे ही न लौट जाना पड़े । उतावली
में पड़कर गरम ही गरम पीने के फेर में कहीं अपना कोई अंग न जला लें ।
गरम (दूध) को जरा ठंडा हो जाने दीजिए तब पीजिए ! (अभी प्रेम का
आरंभ है, इसी में इतनी उतावली ठीक नहीं) ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश अभिलाष, यथा—( सवैया )
(२६५) हैं कोइ माई हितू इनको यह जोइ कहै किहि बाइ बहे हैं ।
न्यायहीं केसव गोकुल की कुलटा कुलनारिन नाँउ लहे हैं ।
देखि री देखि लगाइ टकी इन सोनो सो घालिकै चाहि रहे हैं ।
'को है री को' जैसे जानत नाहिन काल्हि ही वाके संदेस कहे हैं।१४।
१३—आपुन०--आंपु समान । अब--पुनि । दिन--तिन । के--कौ । ही--न ।
कहूँक०--कहूँ को इती रसु, कहूँ बहुतो रुचि । १४—कोइ--कोउ । न्यायहीं--
न्यारही । चाहि-डाहि, डंरि । नाहिन--नाहिं ब ।